Thursday, September 7, 2017

रवींद्र दलित विमर्श-18 गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ। गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे। संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है। भारत में बुद्ध�

रवींद्र दलित विमर्श-18

गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं,इसीलिए उनका वध हुआ।

गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।

संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

भारत में बुद्धमय भारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

पलाश विश्वास

कल हमने रवींद्र के दलित विमर्श के तहत रवींद्र के दो निबंधों जूता व्यवस्था और आचरण अत्याचार की चर्चा की थी।आचरण अत्याचार में जाति व्यवस्था की अस्पृश्यता पर प्रहार करते हुए रवींद्र ने लिखा है कि गाय मारने पर प्रायश्चित्त का विधान है लेकिन मनुष्य को मारने पर सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है , उसी तरह अछूतों को छूने पर जाति चली जाती है लेकिन अछूतों पर अत्याचार,उत्पीड़न और उनकी बेदखली से जाति मजबूत हो जाती है।गोरक्षकों के तांडव में प्रायश्चित्त का विधान अब वध है।

जिस सामाजिक यथार्थ की बात रवींद्र ने उन्नीसवीं सदी में कही थी,वह आजादी के सत्तर साल बाद नरसंहार संस्कृति का नस्ली राष्ट्रवाद है।गोरक्षकों के तांडव पर हिंदू गांधी के पोते की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला बताता है कि कानून का राज और संविधान कितना बेमायने है और कानून व्यवस्था बहाल करने के लिए राष्ट्र की जिम्मेदारी और जबावदेही का क्या हाल है।

गोरक्षकों से नागरिकों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और इसमें भी नागरिकों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है क्योंकि गोरक्षा तांडव अब नस्ली मनुस्मृति राष्ट्रवाद के हिंदुत्व का पर्याय है तो कारोपेरट फासिज्म के राजकाज की राजनीति और सत्ता इसी गोरक्षक सेना के समर्थन से हैं।

हमारी विकास यात्रा हमें लगातार मध्यकालीन बर्बर अंधकार युग की तरफ ले जा रही है,जिसका विकास दर से कोई संबंध नहीं है।विशुद्धता का यह रंगभेदी नस्ली वर्चस्व सभ्यता का संकट है।

ब्रिटिश हुकूमत का अंत हुआ और जैसा कि रवींद्र नाथ ने अपने मृत्युपूर्व लिखे निबंध में ब्रिटिश हुकूमत के स्थानांतरण के बाद भारत के भविष्य को लेकर चिंता जताते हुए चेतावनी जारी की थी,जैसे कि महात्मा ज्योति बा फूले और मतुआ चंडाल आंदोलन के नेता गुरुचांद ठाकुर समेत बहुजन पुरखों को आशंका थी,सत्ता ब्राह्मणवाद के नस्ली वर्चस्व को हस्तातंरित हो जाने के बाद हूबहू वही हो रहा है।

ब्रिटिश हुकूमत में पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली के तहत पेशा बदलने की छूट के तहत जाति व्यवस्था टूटने लगी थी और मनुस्मृति विधान के तहत ज्ञान,आस्था और उपासना,शस्त्र और संपत्ति के अधिकारों से वंचित बहुजनों को वे अधिकार मिलने लग गये थे,जो अब संवैधानिक रक्षाकवच के बावजूद छीने जा रहे हैं और भारतीय नस्ली वर्चस्व की मनुस्मृति संस्कृति फिर वही महिषासुर वध कथा है।

गांधी,दाभोलकर,पनेसर,कुलबर्गी,रोहित वेमुला के बाद गौरी लंकेश की हत्या फिर मनुस्मृति के स्थाई बंदोबस्त को लागू करने का नस्ली राष्ट्रवाद है,जिसका रवींद्रनाथ विरोध कर रहे थे।गौरी लंकेश असुर संस्कृति की अनार्य सभ्यता की द्रविड़ प्रवक्ता थीं, इसीलिए उनका वध हुआ।

यह मामला अभिव्यक्ति का संकट है या असहमति के विरुद्ध असहिष्णुता है,ऐसा राजनीतिक सरलीकरण सामाजिक यथार्थ के खिलाफ है। देशभर में ऐसे तमाम कांड लगातार होते जा रहे हैं और विरोध की रस्म अदायगी के बाद फिर अखंड मौन के मद्य़फिर फिर वध दृश्य की पुनरावृत्ति है।गांधी हत्या के बाद तो फिरभी एक लंबा अंतराल रहा है और दंगों और नरसंहारों में वैदिकी संस्कृति के वध उत्सव के मौन दर्शक बने नागरिक विद्वतजनों पर हो रहे ताजा हमलों में अपनी मौत की दस्तक सुनकर विचलित हो रहा है नागरिक समाज का पढ़ा लिखा तबका।

विरोध जताने की राजनीति के अलावा सामाजिक सक्रियता का अगला कदम उठाने की वह सोच ही नहीं सकता क्योंकि इसी तंत्र के बने रहने में उसके हित हैं।उसका वर्ग वर्ण हितों के विरुद्ध सत्ता परिवर्तन की राजनीति उसके लिए सुविधाजनक विकल्प है और सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिरोध की संस्कृति उसके हितों के खिलाफ है।

गोरक्षकों के तांडव के मानस से भी ज्यादा खतरनाक यह सुविधा का विमर्श।

यही जूता व्यवस्था है ताकि जूता खाकर अपनी खाल बचायी जा सके।यही सवर्ण सत्ता वर्ग का मानस है।

रवींद्र के दलित विमर्श पर संवाद इसी सामाजिक यथार्थ की जांच पड़ताल है।रवींद्र भारत की समस्या को सामाजिक मानतेे रहे हैं और यह सामाजिक समस्या जितनी गुलामगिरि की कथा है,उतनी ही रवींद्र के सामाजिक यथार्थ जूता व्यवस्था यानी नस्ली सत्ता वर्चस्व के अंतर्गत जूता खाते रहकर अपनी हैसियत बचाने की संस्कृति है,जो अब बहुजन संस्कृति है तो यह वैदिकी विशुद्धता की संस्कृति भी है।

गुलामगिरि की जूता व्यवस्था में समाहित बहुजन समाज का यथार्थ यही है और यही बहुजनों का हिंदुत्वकरण है,जिसके दायरे से बाहर बने रहने के लिए इस देश में अनार्य द्रविड़ और दूसरी अनार्य नस्लों की जल जंगल जमीन की लड़ाई है,जिसके दमन के लिए नरसंहार संस्कृति का अंध नस्ली राष्ट्रवाद है।

बुद्धमय भारत के अवसान के बाद नस्ली सत्ता वर्चस्व के मनुस्मृति बंदोबस्त की यह संस्कृति भारत में इस्लामी शासन के करीब सात सौ सालों और ब्रिटिश हुकूमत के दो सौ सालों के दरम्यान बनाये रखने के लिए सत्ता वर्ग ने उनकी गुलामी का महिमामंडन करते हुए उनकी सत्ता में भागेदारी के जरिये बहुजनों और खासतौर पर आदिवासियों का उत्पीड़न और दमन का सिलसिला जारी रखा है और इसीलिए हिंदुत्व एजंडे के तहत हिंदू राष्ट्र के वास्तुकार हिंदू महासभा और संघ परिवार ने भारतीय जनता के एकताबद्ध स्वतंत्रता संग्राम के खिलाफ ब्रिटिश हुकूमत का साथ दिया तो आज वे श्वेत आतंकवाद के अमेरिकी साम्राज्यवाद और इजराइली जायनी आतंकवाद के साथ खड़े हैं।

मनुस्मृति व्यवस्था के सत्ता वर्ण और वर्ग ने इसी तरह शक हुण पठान मुगल विदेशी हुकूमत का कभी विरोध नहीं किया और उनके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम भी बहुजन और आदिवासी समुदायों के लोग, किसान और मेहनतकश तबके लड़ते रहे हैं।

भारत में बुद्धमयभारत के अवसान के बाद हिंदुत्व पुनरूत्थान की प्रक्रिया महिषासुर वध की निरंतरता है और नस्ली राष्ट्रवाद का प्रतीक वही दुर्गावतार है,जिसकी ताजा शिकार गौरी लंकेश है।किसी मोमबत्ती जुलूस से इस व्यवस्था का अंत नहीं होने वाला है।

भारत की मौजूदा समस्याएं राजनीतिक नहीं हैं ,आज भी असमानता,अन्याय और उत्पीड़न,बेदखली और नरसंहार की ये तमाम समस्याएं सामाजिक समस्याएं हैं और उनका राजनीतिकरण करने से वे समस्याएं सुलझने वाली नहीं हैं। सामाजिक बदलाव के बिना सामाजिक यथार्थ बदलेगा नहीं।इसिए सामाजिक यथार्थ को समझना बेहद जरुरी है।

कल हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी का फोन आया था और हमारी उनपर रवींद्र के दलित विमर्श पर लंबी बातचीत हुई।वे रवींद्र के भारतवर्षेर इतिहास की तर्ज हमें इतिहास पढ़ाते रहे हैं और हम इस पर हस्तक्षेप पर चर्चा पहले ही कर चुके हैं।रवींद्र की तरह ही वे मानते हैं कि इतिहास शासक वर्ग का नहीं होता,इतिहास जनता बनाती है और इतिहास जनता का इतिहास होता है।रवींद्र के दलित विमर्श में भारत की समूची दर्शन परंपरा की जनपदीय लोकसंस्कृति की साझा विरासत को सत्ता वर्ग के नस्ली राष्ट्रवाद का एकमात्र प्रतिरोध वे भी मानते हैं।उन्होंने इस संवाद को पुस्तक में समेटने का सुझाव भी दिया है।हमने उनसे यही निवेदन किया कि हम आलोचकों,संपादकों और प्रकाशकों की दुनिया के बाहर के जीव हैं और इसलिए हम पुस्तकें छापने के चक्कर में नहीं पड़ते जो अंततः पढ़े लिखे सवर्म विद्वतजनों तक सीमाबद्ध हो जाती हैं और आम जनता और बहुजनों के साथ संवाद की कोई स्थिति नहीं बनती। इसीलिए हम वैकल्पिक मीडिया की बात करते रहे हैं और इसी सिलसिले में सोशल मीडिया में मोबाइल क्रांति के जरिये जुड़े भारी संख्या में मौजूद बहुजनों और आदिवासियों को सीधे संबोधित करने का प्रयास करते हैं।

इस संवाद की मुख्य समस्या सोशल मीडिया में स्पेस की कमी है।जिस वजह से कल रवींद्र विमर्श-सत्रह को दो भागो में बांटकर हस्तक्षेप में लगाना पड़ा।हमने कल सारा दिन बाउल साहित्य,बाउल गान,बाउल आंदोलन और बाउल रवीद्र के साथ लालन फकीर से संबंधित सामग्री सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

हमने रवींद्र रचना धर्मिता में बुद्धमय भारत की चर्चा की है और वैदिकी संस्कृति के असर की मुख्यधारा में रवींद्र विमर्श के बारे में चर्चा फिलहाल नहीं कर रहे हैं।बाकी लोग ऐसा ही करते रहे हैं।रवींद्र संगीत के प्रेम पर्व और पूजा पर्व विभाजन से इसमें समाहित संत परंपरा और लोक संस्कृति की साझा विरासत का अता पता गायब है।भारत के भक्ति आंदोलन के नामकरण में भी वही विभ्रम है क्योकि दैवी सत्ता के विरोध में भक्ति की प्रासंगिकता नहीं है। इसीतरह रवींद्र संगीत में प्रेम मनुष्यता का धर्म है तो पूजा दैवी सत्ता का विरोध।रवींद्र संगीत और गीतांजली के गीत की भावभूमि सीधे तौर पर बाउल परंपरा से जुड़ती है और रवींद्र को इसलिए बंगाल का सबसे महान बाउल कहा जाता है।

गीताजंलि की रचनाओं के बारे में कहा जाता है कि बाउल लालन फकीर के लोकसंस्कृति में रचे बसे लोक बोली में  अभिव्यक्त दर्शन को रवींद्र ने गीतांजलि में परोसा है।रवींद्र ने बार बार लालन फकीर के बारे में लिखा भी है।

गीतांजलि और रवींद्र संगीत को समझने के लिए बाउल आंदोलन,बाउल पंरपरा और बाुल दर्शन पर विस्तार से चर्चा की जरुरत है।जो एकसाथ संभव नहीं है।जाहिर है कि यह चर्चा लंबी चलने वाली है।

बांग्लादेश में बाउल आंदोलन और संस्कृति पर व्यापक पैमाने पर काम हुआ है और सारी सामग्री बांग्ला में है.वहां जनपदों की लोकसंस्कृति पर लगातार विमर्श और संवाद जारी रहता है और बांग्लादेशी साहित्य भी जनपदों की बोलियों में लिखा जाता है।

हमारे यहां बोलियों की कोई संस्कृति नहीं बची है और मुक्त बाजार ने भारतीय कृषि,किसानों और मेहनतकश तबके, कारोबारियों के साथ साथ जनपदों का और जनपदों की लोक संस्कृति की साझा विरासत का सत्यानाश कर दिया है और इसी के नतीजतन सत्ता वर्चस्व की मुक्तबाजारी कारोपोरेट वध संस्कृति के नस्ली राष्ट्रवाद की यह नस्ली सुनामी है और जनपदों के लोकतंत्र की कृषि व्यवस्था के पांरपारिक उत्पादन संबंधों की साझा विरासत की बहाली के बिना हम मनुस्मृति राष्ट्रवाद के महिषासुर वध की निरंतरता को रोक नहीं सकते।यह बेहद कठिन कार्यभार है।

गौरतलब है कि हम रवींद्र विमर्श से संबंधित संदर्भसामग्री लगातार सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं।मेरे फेसबुक पेज Palash Biswas Updates पर सारी संदर्भ सामग्री और हस्तक्षेप के तमाम लिंक हैं,आप उन्हें अलग से देखते पढ़ते रहे तो हम सोशल मीडिया पर इस विमर्श की सीमाओं को तोड़ सकते हैं।

आज हम बाउल आंदोलन के बारे में थोडी च्रचा करना चाहते हैं।बाउल परंपरा में दैवी सत्ता का निषेध है।मनुष्य की देह ही उनकी आस्था का आधार है।रवींद्र पर बाउल देहतत्व का असर नहीं हुआ,लेकिन पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मनुष्यता के धर्म की बाउल परंपरा के शायद वे सबसे बड़े प्रवक्ता

थे।रवींद्र के जिन गीतों के लिए नोबेल पुरस्कार मिला, वे सारे गीत बााउल मनुष्यता के धर्म के मुताबिक पुरोहित तंत्र और ब्राह्मण धर्म दोनों के खिलाफ हैं।

रवींद्र के बाद हाल में दूसरी बार गीतों के लिए जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला, वे बाब डिलान भी रवींद्र की तरह अपने को बाुल कहते रहे हैं।बाुल परंपरा से जुड़ने के लिए वे बंगाल के बाउलों के साथ बंगाल में रह चुके हैं।

बाउल जाति धर्म से ऊपर हैं।जाति उनकी कुछ भी हो सकती है और धर्म भी उनका कुछ भी हो सकता है।बाउल शब्द की उत्पत्ति चैतन्यलीलामृत में परम वैष्णवों के लिए इस्तेमाल किये गये महाबाउल शब्द में बतायी जाती है।

बाउल दर्शन पर वैष्णव और सूफी दोनों आंदोलनों का असर है और उनकी सहजिया जीवनपद्धति में धार्मिक कर्मकांड,संस्कारों का निषेध है।यह ब्राह्मण धर्म के खिलाफ एक और जनविद्रोह है।

वैष्णव आंदोलन हिंदुत्व में समाहित हो गया लेकिन बाउल परंपरा का जाति धर्म अस्मिताओं से कुछ भी लेना देना नहीं है।उनके लिए मनुष्य की अंतरात्मा ही सार्वभौम है और वही अंतिम सत्ता है और इस अंतरात्मा के अलावा कोई दैवी सत्ता नहीं है।रवींद्र रचनासमग्र में भी दैवी सत्ता के स्थान पर यही अंतरात्मा का स्थान है।चूंकि आत्मा का आधार मनुष्यदेह  है इसलिए बाउलों के लिए देह पवित्रतम है।बाउल गान आत्मचेतना का गीत है।यह अंतरात्मा का आवाहन है।रवींद्र संगीत का पूजा पर्व भी अंतरात्मा का आवाहन है।

सूफी मत का जैसे बौद्ध सहजिया पंथ में समायोजन हुआ तो बाउल आंदोलन बंगाल में बौद्ध,सूफी और वैष्णव धाराओं की मनुष्यता का धर्म और प्रेम और अहिंसा का दर्शन है।इसी बिंदू पर गांधी और रवींद्र के जीवन दर्शन एकाकार हैं,जहां मनुष्यता का उत्कर्ष ही सभ्यता का प्रतिमान है।

लालन फकीर मुसलमान थे लेकिन संत कबीर की तरह उनके जन्म और धर्म को लेकर किंवदंतियां प्रचलित है।

माना जाता है कि वे जन्मजात हिंदू थे और तीर्थयात्रा के दौरान चेचक निकलने पर मरणासण्ण हो जाने की वजह से उनके साथी उन्हें छोड़कर गांव वापस आकर उनके मरने की खबर फैला दी। बीमार हालत में एक मुसलमान परिवार ने उनकी सेवा की और वे बच गये लेकिन उनका धर्म चला गया और वे मुसलमान हो गये।परिवार ने भी उन्हें विधर्मी मानकर त्याग दिया।

बाउल बनने के बाद उन्हीं लालन फकीर के अनुयायीू संत कबीर दास की तरह हिंदू और मुसलमान दोनों संप्रदायों के हैं।

रवींद्र पर वैदिकी साहित्य,बौद्ध साहित्य,बाउल गान के अलावा भारत के संत आंदोलन का गहरा असर रहा है।गुरु नानक,सूरदास और कबीर दास का उनपर गहरा असर रहा है,इस पर हम अलग से चर्चा करेंगे।

बंगाल के बाउलों का बंकिम के आनंदमठ के तथाकथित सन्यासी विद्रोह यानी आदिवासी किसान विद्रोह में साधुओं और फकीरों के साथ बड़ी भूमिका रही है तो बांग्लादेश की लड़ाई में भी वे शामिल रहे हैं।

संस्कृत काव्यधारा के अंतिम महाकवि जयदेव आदिबाउल माने जाते हैं।कवि जयदेव बंगाल में सेनवंश के अंतिम शासक राजा लक्ष्मणसेन के सभाकवि थे।उनके लिखे गीतगोविन्द में श्रीकृष्ण की गोपिकाओं के साथ रासलीला, राधाविषाद वर्णन, कृष्ण के लिए व्याकुलता, उपालम्भ वचन, कृष्ण की राधा के लिए उत्कंठा, राधा की सखी द्वारा राधा के विरह संताप का वर्णन है।

संस्कृत काव्य धारा के विपरीत उन्होंने कृष्ण और राधा को हाड़ मांस के मनुष्य के रुप में चित्रित किया और छंद और अलंकार में संस्कृत का व्याकरण और सौंदर्यशास्त्र को तोड़ते हुए देशज छंद और अलंकार का प्रयोग किया। डॉ॰ ए॰ बी॰ कीथ ने अपने 'संस्कृत साहित्य के इतिहास' में इसे 'अप्रतिम काव्य' माना है। सन् 1784 में विलियम जोन्स द्वारा लिखित (1799 में प्रकाशित) 'ऑन द म्यूजिकल मोड्स ऑफ द हिन्दूज' (एसियाटिक रिसर्चेज, खंड-3) पुस्तक में गीतगोविन्द को 'पास्टोरल ड्रामा' अर्थात् 'गोपनाट्य' के रूप में माना गया है। उसके बाद सन् 1837 में फ्रेंच विद्वान् एडविन आरनोल्ड तार्सन ने इसे 'लिरिकल ड्रामा' या 'गीतिनाट्य' कहा है। वान श्रोडर ने 'यात्रा प्रबन्ध' तथा पिशाल लेवी ने 'मेलो ड्रामा', इन्साइक्लोपिडिया ब्रिटानिका (खण्ड-5) में गीतगोविन्द को 'धर्मनाटक' कहा गया है। इसी तरह अनेक विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से इसके सम्बन्ध में विचार व्यक्त किया है। जर्मन कवि गेटे महोदय ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् और मेघदूतम् के समान ही गीतगोविन्द की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।


कवि जयदेव के राधा कृष्ण प्रेम में बंगाल के दो बड़े आंदोलनों की उत्पत्ति हुई और ये दोनों आंदोलन ब्राह्मण धर्म और पुरोहित तंत्र के खिलाफ हैं।बाउल आंदोलन और वैष्णव आंदोलन की मूल प्रेरणा कवि जयदेव और उनका गीत गोविंदम है जहां प्रेम ही मनुष्यता का दर्शन है।

कवि जयदेव की स्मृति में ही बीरभूम के केंदुुली में सदियों से दुनियाभर के बाउल जयदेव मेले में जुटते हैं।केंदुलि शांतिनिकेतन से 42 किमी दूर है।

বাউল মতবাদকে একটি মানস পুরাণ বলা হয়। দেহের আধারে যে চেতনা বিরাজ করছে, সে-ই আত্মা । এই আত্মার খোঁজ বা সন্ধানই হচ্ছে বাউল মতবাদের প্রধান লক্ষ । ধর্মীয় দৃষ্টিকোণ থেকে দেখলে একে পৃথক দর্শন বুঝায়। কিন্তু আসলে এ কোন পৃথক মতবাদ নয়।

শান্তিনিকেতনের বাটিক প্রিন্টিং-এ বাউলের চিত্র।

এটি ধর্মীয় দর্শন থেকে সৃষ্ট আত্ম চিন্তার রুপভেদ। যা মুলতঃ আত্মার অধ্যাত্ম চেতনার বহিপ্রকাশ। বাংলাদেশের লোক সাহিত্য ও লোকঐতিহ্য, লালন শাহ বিবেচনা-পূর্নবিবেচনা প্রভৃতি গ্রন্থে গবেষকগণ লিখেছেন; আরবের রাজ শক্তির প্রতিঘাতে জন্ম হয়েছে সুফি মতবাদের । এটিকে লালন-পালন করেছে পারস্য। বিকাশ ইরান ও মধ্য এশিয়ায়। পরবর্তিতে যতই পূর্ব দিকে অগ্রসর হতে থাকে এর মধ্যে ততই পূর্বদেশীয় ভাবধারার সম্মিলন ঘটতে থাকে। দহ্মিণ এশিয়ায় এসে অধ্যাত্ম সঙ্গীত চর্যাগীতিতে রুপান্তর হয়। অতপর তুর্কী বিজয়ের মধ্যদিয়ে মধ্যপ্রাচ্যের সূফী-দরবেশ গণের আগমনে বৌদ্ধ সিদ্ধাচর্যাগণের আদর্শ মানবতাবাদ, সুফীবাদে সম্মিলিত হয়ে ভাবসঙ্গীতে রুপান্তর হয় । ফলে সুফী দর্শন অতি সহজে বৌদ্ধের কাছের প্রশংসনীয় হয় । কাজেই একদিকে সূফীবাদ এবং অন্যদিকে বৌদ্ধ সাধনা এই সকলের সমম্বয়ে গড়ে উঠে মরমী ভাব-সাধনা [১][২][৩]। গবেষক সৈয়দ মোস্তফা কামাল, ডঃ আশরাফ সিদ্দিকী সহ অনেকে এ অভিমত পোষন করেন; মধ্যযুগের প্রারম্ভে বাংলার শ্যামল জমিনে অদৈত্ববাদের মধ্যদিয়ে ভারতে চৈতন্যবাদ বিকশিত হয় পঞ্চদশ শতাব্দিতে। তখন ভাগবতধর্ম, আদি রামধর্ম ও কৃষ্ণধর্মের মিলনে বৈঞ্চবধর্ম আত্মপ্রকাশ করে। এতে করে বৈঞ্চবী সাধন পদ্ধতির মধ্যে অনিবার্য রূপে শামিল হয় প্রাচীন মরমীবাদ । ফলে পূর্বরাগ, অনুরাগ, বংশী, বিরহ, দেহকাঁচা ও সোয়া-ময়না সম্মেলিত ইত্যাদি মরমী সাহিত্যের শব্দ, নামে উপনামে বৈঞ্চববাদে বা বৈঞ্চব সাহিত্যে সরাসরি ধার করা হয় । এ ভাবে মরমীবাদের হূদয়স্পর্সী শব্দমালায় রচিত সঙ্গীত বাউল সঙ্গীত নামে আত্মপ্রকাশ করে এক নতুন সম্প্রদায়ের জন্ম দেয়, যা আজকাল বাউল নামে অভিহিত [১]। 'বাহুল' বা 'ব্যাকুল' থেকে 'বাউল' নিষ্পন্ন হতে পারে বলে অনেকেই মনে করেন। আবার আরবি 'আউল' বা হিন্দি 'বাউর' থেকেও শব্দটি আসতে পারে। যেভাবে যে অর্থই আভিধানিক হোক না কেন, মূলত এর ভাব অর্থ হলো, স্রষ্টা প্রেমিক, স্বাধীন চিত্ত, জাতি সম্প্রদায়ের চিহ্নহীন এক দল সত্য সাধক, ভবঘুরে[২]। বাউলদের মনের ভাব প্রকাশের মাধ্যম হচ্ছে বাউল সঙ্গীত নামে পরিচিত আধ্যাত্মচেতনার গান । এ বিষয়ে দেওয়ান মোহাম্মদ আজরফ বলেছেন : ইদানিং বাউল শব্দের উৎপত্তি নিয়ে নানা বাক-বিতন্ডার সৃষ্টি হয়েছে। কেউ বা একে সংস্কৃত 'বতুল' (উন্মাদ, পাগল, ক্ষেপা, ছন্নছাড়া, উদাসী) শব্দের অপভ্রংশ বলে মনে করেন । তবে যা থেকেই বাউল শব্দের উৎপত্তি হোক না কেন, বর্তমানে বাউল মতবাদ একটি বিশেষ মতবাদে পরিণত হয়েছে। [১]

বাউল মতবাদ

https://bn.wikipedia.org/s/21xy


The Kenduli Mela provides a unique opportunity to catch a glimpse of the wandering minstrels called Bauls, who believe in the simplicity of love of life and who propagate universal love that transcends religion. Thousands of people from all over the country and overseas flock to this three-day musical event which celebrates soulful music and is an opportunity to meet the Bauls in their saffron attire carrying a musical instrument called the Ektara.

प्रेम के इसी दर्शन पर आधारित है चैत्नय महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन जिसके तहत हरिमाम के जाप के तहत अछूतों को व्यापक पैमाने पर हिंदू मान लिया गया।बंगाल में अस्पृश्यता बाकी बारत की तुलना में उतना कठोर न होने का बड़ा कारण अनार्य द्रविड़ सभ्यता के साथ साथ बौद्धमय विरासत है तो दूसरा बड़ा कारण चैतन्य महाप्रभू का वैष्णव आंदोलन है,जो वैदिकी कर्म कांड के विपरीत पुरोहित तंत्र के विपरीत विशुद्ध मनुष्यता के धर्म पर आधारित प्रेम का दर्शन है और यही प्रेम का दर्शन बाउल पंरपरा है।

गौरतलब है कि लालन फकीर पर भी हमले होते रहे और बाउलों के साथ साथ वैष्णवों के अखाड़ों पर भी कट्टरपंथियों के हमले होते रहे।बाउल धर्मनिरपेक्षता हमेशा निशाने पर रही है तो पुरी यात्रा के दौरान चैतन्य महाप्रभु की रहस्यमय मृत्यु हो गयी और उनकी देह का पता ही नहीं चला जैसे संत तुकाराम सशरीर वैकुंठ चले गये,उसी तरह कहा गया कि चैतन्य महाप्रभु भी भगवान जगन्नाथ के शरीर में समाहित हो गये।

दरअसल पुरोहित तंत्र ने ही संत तुकाराम और चैतन्य महाप्रभु की हत्या कर दी और असहिष्णुता का वही आतंकवाद जारी है।

The word Baul comes from the Sanskrit "Batul," which means mad, or "afflicted by the wind disease." The Bauls are India's wandering minstrels of West Bengal, whose song and dance reflect the joy, love and longing for mystical union with the Divine. Bauls are free thinkers who openly declare themselves to be mad for the God who dwells within us all.

The Bauls of Bengal have made no effort to record their practices, lives or beliefs, for they are reluctant to leave a trace behind. Therefore little concrete documentation is available when exploring the group's origin. Scholars have instead turned to the songs of the Bauls to piece together their potential history. Examining the style and language of the Bauls' music, links the sect to distinct groups that share their unique style of worship.

The first traces of practices similar to those of the Bauls appear in the caryāpadas, the oldest texts recorded in Bengali tongue. These ancient documents – dating back nearly one thousand years – contain poems once sung by a religious sect of Bengal known as the Siddhācāryas. The caryāpadas reference the appropriate behaviors and restraints for an individual wishing to be find the "ultimate release." The Bauls share this early sect's philosophy of achieving personal freedom through practical means and worship, also known as Tantra. The poems of the Siddhācāryas also have a similar metaphoric nature to those of the Bauls vague and often enigmatic songs.

The Siddhācāryas are thought to have been diverse in background, as the caryāpadas contain ideas and phrases of both Buddhist and Saivite Hindu origins. Their religious diversity and shared goal of personal liberation strongly link this Bengali group to the Bauls that had yet to exist as we know them today.

However as India has progressed drastically over the course of history, the religious make-up of Bengal has shifted as well. Islam and Vaisnavism dominate where Buddhism and Saivite Hinduism once did. The dramatic shift in religious climate opened the door for individuals to combine the influence of the various forms of spirituality. A few of the Bauls recorded songs mention Nerā, a caste derived from the former Buddhist monks and nuns who, with the slow decline of Buddhism, abandoned celibacy for a tantric style of worship similar to the Bauls. The references to this caste in Baul music again supplies scholars a thread with which to connect this mysterious group to the past.

Before, the Bauls roamed Bengal on foot; nomads spreading their music and dance. In each village there was a special house set aside for them to stay in, and they would stay as long as they pleased. When they would arrive, the villagers would supply them with food and the necessities of life for as long as their visit lasted. Subhendu "Bapi" Das says:

"That was the responsibility of the village people. And the bauls' responsibility is to make them happy, give them happy, give them a clear message of life, so they can go on with their happy soul."

He has also said that unfortunately modern India can no longer support their nomadic way of living, so therefore they have had to adapt. "Now it is totally different. Before, people have respect for many things, and now those things are gone because the time is changing. Now bauls have their own house and they stay in one place, not moving around. Baba (Purna Das Baul) has a house in Calcutta, and he is very famous for this type of music and this tradition and philosophy. People respect him and they are making lots of concerts to him, and that's how the life is going on," says Bapi Das.

https://bauls.wordpress.com/history/