आज के 'जनसत्ता' में मदन कश्यप की मार्मिक कविता. "अदालत को अच्छी तरह पता था/ कि उसे कुछ नहीं पता था/ फकत तेरह साल लगे यह जानने में/ कि सब कुछ दरअसल कुछ नहीं था/ इतने ही साल लगे हाशिमपुरा में/ इतने या इससे कुछ अधिक बथानी टोला में". "क़ानून की धज्जियां उड़ा कर पैसे बटोरने वाले अधिवक्ताओ/ खुद पर फक्र करो/ तुमने किसी मुद्दई को नहीं मनुष्यता को पराजित किया है".
বাঙালির সম্পূর্ণ ভূগোল,ইতিহাস,সংস্কৃতি,সাহিত্য, শিল্প,অর্থ,বাণিজ্য,বিশ্বায়ণ,রুখে দাঁড়াবার জেদ, বৌদ্ধময় ঐতিহ্য, অন্ত্যজ ব্রাত্য বহিস্কৃত শরণার্থী জীবন যাপনকে আত্মপরিচয়,চেতনা,মাতৃভাষাকে রাজনৈতিক সীমানা ডিঙিয়ে আবিস্কার করার প্রচেষ্টা এই ব্লগ,আপনার লেখাও চাই কিন্তু,যে স্বজনদের সঙ্গে যোগাযাগ নেই,তাঁদের খোঁজে এই বাস্তুহারা তত্পরতা,যেখবর মীডিয়া ছাপে না, যারা ক্ষমতার, আধিপাত্যের বলি প্রতিনিয়তই,সেই খবর,লেখা পাঠান,খবর দিন এখনই এই ঠিকানায়ঃpalashbiswaskl@gmail.com
Sunday, June 21, 2015
आज के 'जनसत्ता' में मदन कश्यप की मार्मिक कविता. "अदालत को अच्छी तरह पता था/ कि उसे कुछ नहीं पता था/ फकत तेरह साल लगे यह जानने में/ कि सब कुछ दरअसल कुछ नहीं था/ इतने ही साल लगे हाशिमपुरा में/ इतने या इससे कुछ अधिक बथानी टोला में". "क़ानून की धज्जियां उड़ा कर पैसे बटोरने वाले अधिवक्ताओ/ खुद पर फक्र करो/ तुमने किसी मुद्दई को नहीं मनुष्यता को पराजित किया है".
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