বাঙালির সম্পূর্ণ ভূগোল,ইতিহাস,সংস্কৃতি,সাহিত্য, শিল্প,অর্থ,বাণিজ্য,বিশ্বায়ণ,রুখে দাঁড়াবার জেদ, বৌদ্ধময় ঐতিহ্য, অন্ত্যজ ব্রাত্য বহিস্কৃত শরণার্থী জীবন যাপনকে আত্মপরিচয়,চেতনা,মাতৃভাষাকে রাজনৈতিক সীমানা ডিঙিয়ে আবিস্কার করার প্রচেষ্টা এই ব্লগ,আপনার লেখাও চাই কিন্তু,যে স্বজনদের সঙ্গে যোগাযাগ নেই,তাঁদের খোঁজে এই বাস্তুহারা তত্পরতা,যেখবর মীডিয়া ছাপে না, যারা ক্ষমতার, আধিপাত্যের বলি প্রতিনিয়তই,সেই খবর,লেখা পাঠান,খবর দিন এখনই এই ঠিকানায়ঃpalashbiswaskl@gmail.com
Thursday, May 17, 2018
अफसोस,शिवराम और महेंद्र नेह भी पार्टी से निकाल दिये गये और कामरेडों ने उन्हें सव्यसाची के साथ भुला दिया। पलाश विश्वास
रवींद्र विमर्श को कितने लोग समझते हैं,रवींद्र को कितने लोग जानते हैं? पलाश विश्वास
I was with religious fanatics for many years. In fact, I was one of them. They don't understand Tagore, and his message of universal humanity and emancipation. Their hate and bigotry is dark, divisive, and past. Rabindranath Tagore is love, light and future.
On the birthday of poet-philosopher-educator Rabi
বাঙালিদের একটা স্বভাব আছে, খুব কম জেনেও অনেক কথা বলা। তাও আবার ভুল বানানে। যাই হোক, আমি তো আর ব্যাকরণচঞ্চু নই। তাও, রবীন্দ্রনাথের উক্তি বলে যাহোক তাহোক কারুর একটা ভুলভাল উক্তি ভুল-বানানে কোট করে দিচ্ছে দেখলে মনে একটা রক্তলোলুপ প্রতিহিংসার মনোভাব জাগে। ভীষণরকম নন-ভায়োলেন্ট বলে কিছু করতে পারিনা। এই করে করে আঙুলের নখগুলো চিবিয়ে আখের ছিবড়ে করে ফেলেছি।
বাঙালি কত জানে! শ্লীলতা অশ্লীলতার ব্যাপারটা তো আছেই। আমেরিকা ঘোর অশ্লীল। বীভৎস। "ওখানে যা সব ব্যাপার হয়, সে আর কী বলবো মশাই। ট্রেন বাস রাস্তাঘাট পার্কে পশ্চিমে সর্বত্র চূড়ান্ত বেলেল্লাপনা চলে। মানুষ, না কুকুর?" "কোথায় দেখলেন, দাদা, দিদি?" "দেখার কোনো দরকার নেই। খবর পাই।" "আহা, কোথায় খবরটা পেলেন, সেটা বলুন?" "ওই তো, আমাদের এক ভাগ্নের বাড়িওলার ছোট ছেলের মেজো শালা গিয়েছিলো।" "ও আচ্ছা, তাই বলুন। আপনি অন্যের মুখের ঝোল ঝাল অম্বল খাচ্ছেন।"
এই পর্যন্ত বলার পরে কথার মোড় অন্যদিকে ঘুরেই যাবে। কারণ বক্তা এখন রেগে আগুন, এবং বিলো-বেল্ট একখানা ঝাড়ার জন্যে তৈরী হচ্ছেন। "আরে যান যান মশাই। আপনাদের আমেরিকার কথা আর বলবেন না।" "কেন, আবার কী হলো?" "কী আপনি আমেরিকায় স্কুলে ছেলেমেয়েদের ওপর মারধোর করা হয়না বলছেন? ছাত্রদের প্রতি হিংসা হচ্ছে না কিন্তু তারা নিজেরা হিংসা ছড়াচ্ছে এবং গুলি করে মানুষ খুন করছে বিনা কারণে। আমেরিকার কাণ্ড কারখানা দেখে হাঁসাও যায় না কাঁদাও যায় না।" (অ্যাকচুয়াল কমেন্ট আজকেই -- বানান বিভীষিকার "হাঁসি"।)। আমার উত্তর, " "তারা নিজেরা হিংসা ছড়াচ্ছে এবং গুলি করে মানুষ খুন করছে বিনা কারণে ।" -- কোথায় হলো? আপনারা কত জানেন! আমেরিকা সম্পর্কে কিছু না জেনেই সেখানকার ছাত্রদের সম্পর্কে আপনাদের কী মূল্যবান ধারণা! বরং, ফ্লোরিডার বন্দুকবাজির পরে সারা আমেরিকায় ছাত্রছাত্রীরা প্রতিবাদ করে রাস্তায় নেমেছে এই ভায়োলেন্স বন্ধ করার জন্যে। এসব খবর কি আপনাদের কানে পৌঁছয় না?"
এইরকম আরো আছে। অনেক। যদি বলি, এর পরেও কি আপনি আপনার ছেলেকে বা মেয়েকে আমেরিকায় আসার চান্স পেলে বন্ধ করবেন তার আসা?" তখন দেখবেন, সবাই অদৃশ্য। কিন্তু, ঝাল ঝাড়া থেকেই যাবে। যদি বলেন, "আচ্ছা, আমেরিকার ম্যাকডোনাল্ড, কোক, পিজ্জা হাট, কে এফ সি'তে যান না কখনো?" নিঃশব্দ। "আমেরিকান সিনেমা দেখেন না?" কেউ নেই তখন স্টেজে।
আর যা যা দেখেন আমেরিকার জিনিস (ইচ্ছে করেই "জিনিস" লিখলাম ভুল বানানে) -- শ্লীলতার খাতিরে সেসব আর লিখলাম না। আফটার অল, এই ফেসবুকে আমার বৌ, বোন, বন্ধু আর হাজার ছাত্রছাত্রী আছে। কিছুটা শুনুন, আর অন্যটা ইম্যাজিন করে নিন। সত্যজিৎ রায়ের "নীল আতঙ্ক" এর কাছে শিশু!
আমেরিকার শাসকদের বিরুদ্ধে, যুদ্ধ, সি আই এ, বন্দুকবাজি, পুলিশি অত্যাচার, মিডিয়া ও মানবাধিকার লঙ্ঘনের বিষয়ে আমি এতো লিখেছি যে লোকে ভাবে আমি পাগল। এতোই মূর্খ যে নিজের ভালোমন্দ, নিরাপত্তাও বুঝিনা। যা খুশি লিখি। একদিকে এইসব লিখি, আবার অন্যদিকে আমেরিকার বা অন্য কিছুটা উন্নত দেশের শিক্ষাব্যবস্থার আধুনিকতা, নারীর স্বাধীনতা সমানাধিকার, শিশুদের জন্যে হাজার আনন্দ পার্ক খেলার ব্যবস্থা সিনেমা, তারা যাতে ভয়হীন ভাবে বড় হতে পারে, তার জন্যে স্কুলে একেবারে প্রথম থেকেই নিবেদিতপ্রাণ শিক্ষক শিক্ষিকাদের দেওয়া ভালোবাসা -- তা নিয়ে লিখেছি বহু বছর ধরে। আবার এই মার্কিন বন্ধু ও বান্ধবীদের, গুরুস্থানীয় মানুষদের খুব কাছ থেকে দেখেছি হিউম্যান রাইটস'এর কাজ করতে, পরিবেশ নিয়ে আন্দোলন করতে, যুদ্ধের বিরুদ্ধে রাস্তায় নামতে। তাদের কাছে অনেক শিখেছি।
এইসব কথা বাঙালিরা তেমন কেউ জানতেও চায়না। শিখতেও চায়না। কিন্তু বাজে বকতে তো আর পয়সা লাগেনা। আর সেন্টিমেন্টাল বাঙালি বাজে বকতে পেলে আর কিছু চায়না। কাজেই ....
ফেসবুকে এসব কথা বলে কোনো লাভ আছে কি? যেখানে একটা তিনশো বছরের পুরোনো ঠাকুর, অথবা তিন বছরের পুরোনো কুকুরের ছবি পোস্ট করলে তিন হাজার নতুন লাইক পাওয়া যায়?
শ্লীলতা অশ্লীলতা আলোচনায় অনেক বাঙালি কুকুর প্রসঙ্গ এনেছেন। আমার মনে হয়, এঁরা মানুষ যত না চেনেন, কুকুর চেনেন তার চেয়ে বেশি। আমার মনে হয়, এঁরা আসলে সবাই সেই ধর্মরাজরূপী সারমেয়নন্দন। নইলে, এতো ধার্মিক আবার কুকুর-বিশেষজ্ঞ -- একসাথে এমন আশ্চর্য সঙ্গম তাঁদের মধ্যে ঘটলো কী করে?
এ যে অদ্ভুত মিরাক্কেল!
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রবীন্দ্র জয়ন্তীতে আমার কবি প্রণাম।
নিউ ইয়র্ক, ইউ এস এ।
अब बंगाल में या अन्यत्र वर्चस्ववादी,पाखंडी वामपंथी अपना वजूद बनाने के लिए संघियों के साथ सरकार भी बना ले तो मुझे कम से कम ताज्जुब नहीं होगा।
प्रेरणा अंशु किसान,गांव,प्रकृति और पर्यावरण पर विमर्श की पत्रिका है ताकि किसानों,कामगारों और बहुसंख्य वंचितो के हित में विकास के जनमुखी माडल के साथ समता और न्याय के आधार पर समाज का निर्माण हो।
प्रेरणा अंशु के संस्थापक संपादक और मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता दिवंगत मास्टर प्रताप सिहं के सपनों और आदर्सों के मुताबिक प्रेरणा अंशु किसान,गांव,प्रकृति और पर्यावरण पर विमर्श की पत्रिका है ताकि किसानों,कामगारों और बहुसंख्य वंचितो के हित में विकास के जनमुखी माडल के साथ समता और न्याय के आधार पर समाज का निर्माण हो।
Tuesday, May 8, 2018
महाश्वेता देवी के धनबाद के दो घनिष्ठ लोगः कामरेड एके राय और मैं
महाश्वेता देवी के धनबाद के दो घनिष्ठ लोगः कामरेड एके राय और मैं
पलाश विश्वास
सत्ताइस साल कोलकाता और बंगाल में बिताने के बाद मैं उत्तराखंड की तराई के दिनेशपुर रूद्रपुर इलाके में अपने गांव वापस जा रहा हूं।ऐसे में हमेशा के लिए बंगाल छोड़ जाने का दुःख के साथ आखिरकार अपने गांव अपने लोगों के बीच जा पाने की खुशी दोनों एकाकार है।अब मैं यहां का डेरा समेटने में लगा हूं तो ऐसे में धनबाद से कामरेड एके राय के गंभीर रुप से बीमार पड़ने की खबर मिली है।
दैनिक हिंदुस्तान के संपादकीय पेज पर मेरे चर्चित उपन्यास अमेरिका से सावधान पर लिखते हुए अपने लेख में महाश्वेता दी ने धनबाद में कामरेड एके राय और मेरे साथ घनिष्ठ संपर्क होने की बात लिखी थी।महाश्वेता दी कई बरस हुए,नहीं हैं।अभी अभी कामरेड अशोक मित्र का भी अवसान हो गया।नवारुणदा महाश्वेता देवी से पहले कैंसर से हार कर चल दिये।कोलकाता का बंधन इस तरह लगातार टूटता जा रहा था। 1984 में मैंने धनबाद छोड़ और तबसे लेकर अबतक धनबाद से कोई रिश्ता बचा हुआ था तो वह कामरेड एके राय के कारण ही।
यूं तो 1970 में ही आठवीं पास करने से पहले तराई से जगन्नाथ मिश्र के बाद शायद पहले पत्रकार गोपाल विश्वास संपादित अखबार तराई टाइम्स में मैं छपने लगा था।हालांकि चूंकि मेरे पिता सामाजिक कार्यकर्ता और किसानों और शरणार्थियों के नेता पुलिनबाबू की मदद के लिए देश भर के शरणार्थियों और किसानों की समस्याओं पर कक्षा दो से ही मुझे नियमित लिखना पढ़ता था क्योंकि पिताजी हिंदी में बेहतर लिख नहीं पाते थे।1973 में जीआईसी नैनीताल पहुंचने के बाद गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी की प्रेरणा से मेरा हिंदी पत्र पत्रिकाओं में विभिन्न विधाओं में नियमित लेखन शुरु हो गया। लेकिन जनसरोकार और वैज्ञानिक सोच के साथ लेखन का सिलसिला नैनीताल समाचार से शुरु हुआ।
राजीव लोचन शाह,गिरदा और शेखर पाठक,नैनीताल समाचार,पहाड़ और उत्तराखंड संघर्षवाहिनी के तमाम साथी मेरे थोक भाव से लगातार अब तक लिखते रहने की बुरी आदत के लिए जिम्मेदार हैं।इनमें भी गिरदा,विपिन त्रिपाठी,निर्मल जोशी,भगतदाज्यू जैसे आधे से ज्यादा लोग अब नहीं है। एक तो बांग्लाभाषी,फिर अंग्रेजी माध्यम और अंग्रेजी साहित्य के विद्यार्थी के इस तरह आजीवन हिंदी साहित्य न सही,हिंदी पत्रकारिता में खप जाने के पीछे इन सभी लोगों का अवदान है।
एमए पास करने के बाद कालेजों में नौकरी करने का विकल्प मेरे पास खुला था लेकिन मैं डीएसबी नैनीताल में पढ़ाना चाहता था और इसके लिए पीएचडी जरुरी थी।इसी जिद की वजह से मैं नैनीताल छोड़ने को मजबूर हुआ और इलाहाबाद विश्वविद्यालय पहुंच गया।इलाहाबाद में शैलेश मटियानी और शेखर जोशी के मार्फत पूरी साहित्यिक बिरादरी से आत्मीयता हो गयी,लेकिन वीरेनदा और मंगलेश दा के सुझाव मानकर मैं उर्मिलेश के साथ जेएनयू पहुंच गया।वहीं मैंने महाश्वेता दी का उपन्यास जंगल के दावेदार हिंदी में पढ़ा।
इसी दरम्यान उर्मिलेश कामरेेड एके राय से मिलने धनबाद चले गये,जहां दैनिक आवाज में मदन कश्यप थे।मैं बसंतीपुर गया तो एक आयोजन में झगड़े की वजह से सार्वजनिक तौर पर पिताजी ने मेरा तिरस्कार किया।अगले ही दिन उर्मिलेश का पत्र आया कि धनबाद में आवाज में मेरी जरुरत है। वे दरअसल उर्मिलेश को चाहते थे लेकिन तब उर्मिलेश जेएनयू में शोध कर रहे थे और पत्रकारिता करना नहीं चाहते थे।उन्होंने मुझे पत्रकारिता में झोंक दिया,हांलाकि बाद में वे भी आखिरकार पत्रकार बन गये। शायद दिलोदिमाग में बीरसा मुंडा के विद्रोह और कामरेड एके राय के आंदोलन का गहरा असर रहा होगा कि पिताजी के खिलाफ गुस्से के बहाने शोध, विश्वविद्यालय, वगैरह अकादमिक मेरी महत्वाकांक्षाएं एक झटके के साथ खत्म हो गयी और मैं धनबाद पहुंच गया।
अप्रैल,1980 में दैनिक आवाज में काम के साथ आदिवासियों और मजदूरों के आंदोलनों के साथ मेरा नाम जुड़ गया और बहुत जल्दी एकेराय,शिबू सोरेन और विनोद बिहारी महतो से घनिष्ठता हो गयी। वहीं मनमोहन पाठक, मदन कश्यप,बीबी शर्मा,वीरभारत तलवार और कुल्टी में संजीव थे,तो एक टीम बन गयी और हम झारखंड आंदोलन के साथ हो गये,जिसके नेता कामरेड एके राय थे जो धनबाद के सांसद भी थे।
एके राय झारखंड को लालखंड बनाना चाहते थे और उनकी सबसे बड़ी ताकत कोलियरी कामगार यूनियन थी।वे अविवाहित थे और सांसद होने के बावजूद एक होल टाइमर की तरह पुराना बाजार में यूनियन के दफ्तर में रहते थे।अब भी शायद वहीं हों।
कोलियरी कामगार यूनियन ने धनबाद में प्रेमचंद जयंती पर महाश्वेता देवी को मुख्य अतिथि बनाकर बुलाया।वक्ताओं में मैं भी था।महाश्वेता दी के साथ कामरेड एके राय और मेरी घनिष्ठता की वह शुरुआत थी।
यहीं से मेरे लेखन में किसानों और शरणार्थियों के साथ साथ आदिवासी और मजदूरों की समस्याएं प्रमुखता से छा गयीं तो नैनीताल समाचार और पहाड़ की वजह से पिछले करीब चालीस साल तक पहाड़ से बाहर होने के बावजूद हिमालय और उत्तराखंड से मैं कभी दूर नहीं रह सका।
महाश्वेता दी मुझे कुमायूंनी बंगाली लिखा कहा करती थी।
कामरेड एके राय एकदम अलग किस्म के मार्क्सवादी थे।जो हमेशा जमीन से जुड़े थे और विचारधारा से उनका कभी विचलन नहीं हुआ।बल्कि शिबू सोरेन और सूरजमंडल की जोड़ी ने कामरेड एके राय को झारखंड आंदोलन से उन्हें दीकू बताते हुए अलग थलग कर दिया तो झारखंड आंदोलन का ही विचलन और विघटन हो गया।कामरेड राय लगातार अंग्रेजी दैनिकों में लिखते रहे हैं और उनका लेखन भी अद्भुत है।
भारतीय वामपंथी नेतृत्व ने कामरेड एकेराय और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के नेता,आर्थिक सुधारों के पहले शहीद शंकर गुहा नियोगी का नोटिस नहीं लिया,जो सीधे जमीन से जुड़े हुए थे और भारतीय सामाजिक यथार्थ के समझदार थे।
वामपंथ से महाश्वेता दी के अलगाव की कथा भी हैरतअंगेज है।यह कथा फिर कभी।
अशोक मित्र, ऋत्विक घटक,सोमनाथ होड़,देवव्रत विश्वास जैससे भारतीय यथार्थ के प्रति प्रतिबद्ध लोगों को भी वामपंथ का वर्चस्ववादी कुलीन नेतृत्व बर्दाश्त नहीं कर सका।आज भारतीय राजनीति में हाशिये पर चले गये वामपंथियों को इस सच का सामना करना ही चाहिए।
Wednesday, May 2, 2018
बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव? पलाश विश्वास
बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव?
पलाश विश्वास
मई दिवस को जनता के अर्थशास्त्री डा.अशोक मित्र का 9.15 पर निधन हुआ। प्राध्यापक इमानुल हक की फेसबुक पोस्ट से दस बजे के करीब खबर मिली।
पुष्टि के लिए टीवी चैनलों को ब्राउज किया तो 10.30 बजे तक कहीं कोई सूचना तक नहीं मिली।गुगल बाबा से लेकर अति वाचाल सोशल मीडिया के पेज खंगाले तो कुछ पता नहीं चला।फिर हारकर एबीपी आनंद पर पंचायत चुनाव को लेकर पैनली चीख पुकार के मध्य स्क्रालिंग पर निधन की एक पंक्ति की सूचना मिली तो लिखने बैठा।
आज कोलकाता में कोई अखबार प्रकाशित नहीं हुआ और टीवी पर कहीं भी अशोक मित्र की कोई चर्चा नहीं है।रविवार से लेकर बुधवार तक दीदी की कृपा से दफ्तरों में अवकाश है तो कोलकाता में भी छुट्टी का माहौल है।कहीं पर अशोक मित्र पर कोई चर्चा नहीं है।
सुबह समयांतर के संपादक आदरणीय पंकज बिष्ट का फोन आया तो पता चला कि दिल्ली में आज अखबारों में खबर तो आयी है लेकिन टीवी चैनलों पर अशोक मित्र नहीं है।देश को मालूम ही नहीं पड़ा कि किसी अशोक मित्र का निधन हो गया है।
इसके विपरीत,आज के बांग्लादेश के अखबारों और टीवी चैनलों को देखा तो वहीं सर्वत्र इस उपमहाद्वीप के महान अर्थशास्त्री और साहित्यकार अशोक मित्र की चर्चा हर कहीं देखकर हैरत हुई कि उनके मुकाबले हमारी सांस्कृतिक हैसियत कहां है,यह सोचकर।
अभी हाल में एक बालीवूड अभिनेत्री के शराब पीकर विदेश में बथटब में दम घुटने से हुई मौत पर हफ्तेभर का राष्ट्रीय शोक का नजारा याद आता है तो अहसास होता है कि जो बिकाऊ है,वही मुक्त बाजार का सांस्कृतिक सामाजिक और राष्ट्रीय आइकन है।
वैसे भी हिंदी समाज को अपनी संस्थाओं,विरासत और इतिहास की कोई परवाह नहीं होती।बाकी भारतीय भाषाओं में भी पढ़ने लिखने का मतलब या तो साहित्य है या फिर धर्म या अपराध या सत्ता की राजनीति,राजनीति विज्ञान नहीं।
इतिहास के नाम पर हम मिथकों की च्रर्चा करते हैं।इतिहास लेखन हमारी विरासत नहीं है।इतिहास की चर्चा करने पर हम सीधे वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण ,महाभारत, मनुस्मृति, इत्यादि की बात करते हैं,जिसे साहित्य तो कहा जा सकता है,इतिहास कतई नहीं।
एशिया के मुकाबले यूरोप में मध्ययुग में गहन अंधकार कहीं ज्यादा था।अमेरिका का इतिहास ही कुश सौ साल का है।लेकिन यूरोप और अमेरिका में नवजागरण के बाद ज्ञान विज्ञान के सभी विषयों और विधाओं की अकादमिक चर्चा होती रही है।वस्तुगत विधि से समय का इतिहास सिलसिलेवार दर्ज किया जाता रहा है तो हम मध्ययुग से पीछे हटते चले जा रहे हैं और आदिम बर्बर प्राचीन असभ्यता के काल में,जहां हमारी संस्कृति में हिंसा और घृणा के सिवाय कुछ बचता ही नहीं है।
हम मिथकों और धर्मग्रंथ को इतिहास मानते हुए अत्याधुनिक तकनीक से ज्ञान विज्ञान की लगातार हत्या कर रहे हैं।यही हमारा राष्ट्रवादी उन्माद है,जिसका इलाज नहीं है।
एक छोटे से द्वीप इंग्लैंड की भाषा अंग्रेजी सिर्फ नस्ली और साम्राज्यवादी वर्चस्व से पूरी दुनिया पर राज कर रही है,इस धारणा के चलते हम अंग्रेजी से घृणा करते हैं।लेकिन अंग्रेजी भाषा और साहित्य में विश्वभर की तमाम संस्कृतियों,साहित्य और ज्ञान विज्ञान पर जो सिलसिलेवार विमर्श जारी है,उसके मुकाबले हमने भारतीय भाषाओं में साहित्य और धर्म के अलावा ज्ञान विज्ञान पर आम जनता को संबोधित किसी संवाद का उपक्रम शुरु ही नहीं किया है।ज्ञान हमारी शिक्षा का उद्देश्य नहीं रही है और न रोजगार का मकसद शिक्षा का है।यह हमारी क्रयशक्ति का अश्लील प्रदर्शन है।
आज जो लूट का तंत्र देश को खुले बाजार बेच रहा है,उसकी वजह यही है कि शिक्षा के अभूतपूर्व विकास के बावजूद ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में पाठ्यक्रम की परिधि से बाहर हम अब भी अपढ़ हैं और हम चौबीसों घंटे राजनीति पर चर्चा करते रहने के बावजूद राजनीति नहीं समझते।
हमारी कोई वैज्ञानिक दृष्टि नहीं है और न हमारा कोई इतिहास बोध है।
हमने देश को मुक्तबाजार बना दिया है और धार्मिक कर्मकांड को ही सांस्कृतिक विरासत मानते हुए सांस्कृतिक बहुलता और विविधता के साथ साथ इतिहास और भूगोल की हत्या कर दी।
बाजार का व्याकरण ही हमारे लिए अर्थशास्त्र है और उत्पादन प्रणाली और श्रम से,उत्पादकों से हमारा कोई रिश्ता नहीं है।
गांव,खेत और किसानों के साथ साथ देशी उद्योग,धंधों के कत्लेआम के दृश्य देखने के लिए हमारी कोई आंख नहीं बची है।
छात्रों,युवाजनों,बच्चों,महिलाओं और वयस्कों की असहाय असुरक्षित स्थिति से हमें कोई फर्क तब तक नहीं पड़ता जबकि हम अपने गांव या नगर महानगर में बाजार में उपलब्ध भोग सामग्री के उपभोग से वंचित न हो जायें।
ऐसे परिदृश्य में में न परिवार बचा है और न समाज।
अब हम कह नहीं सकते कि मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं।
हम पूरी तरह असामाजिक हो गये हैं।
हमारा कोई सामुदायिक जीवन नहीं है।
इसीलिए इतिहास,सांस्कृतिक विरासत, विविधता, बहुलता, लोकतंत्र, संप्रभुता,स्वतंत्रता,समानता,न्याय,प्रेम जैसी अवधारणाएं हमारे लिए बेमायने हैं।
टीवी पर जो नजर आये,जो जैसे भी हो करोड़पति अरबपति हो जाये, वे ही हमारे आदर्श है।हमारा न कोई पूर्वज है, न हमारा कोई मनीषी है, न हमारी कोई संस्कृति है, न हमारा कोई इतिहास है।
न हमारा कोई अतीत है और न वर्तमान, और न भविष्य।
न हमारा कोई राष्ट्र है और न कोई राष्ट्रीयता।
सिर्फ अंध राष्ट्रवाद है।
हमारे दिलोदिमाग में बाजार है बाकी हम डिजिटल इंडिया है,जिसका न कोई संविधान है और न कोई कानून।
बाजार के चमकते दमकते चेहरों के मुकाबले किसी अशोक मित्र का क्या भाव?
Friday, November 24, 2017
मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान! पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग। यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।
मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान!
पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।
यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।
राजनीति,कारपोरेट वर्चस्व और मीडिया का त्रिशुल परमाणु बम से भी खतरनाक।
सामाजिक तानाबाने को मजबूत किये बिना हम इस कारपोरेट राज का मुकाबला नहीं कर सकते।
पलाश विश्वास
मंदिर मस्जिद विवाद से देश में कारपोरेट राज बहाल तो जाति युद्ध से जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।
पद्मावती विवाद का तो न कोई संदर्भ है और न प्रसंग।
मंदिर मस्जिद विवाद के धारमिक ध्रूवीकरण से इस देश की अर्थव्यवस्था सिरे से बेदखल हो गयी और मुकम्मल कारपोरेट राज कायम हो गया।
तो यह समझने की बात है कि पद्मावती विवाद से नये सिरे से जातियुद्ध छेड़ने के कारपोरेट हित क्या हो सकते हैं।
यह देश व्यापी महाभारत भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को सिरे से खत्म करने वाला है।
यह मुकम्मल मनुस्मृति राज का कारपोरेट महाभारत है।
यह जनसंख्या सफाये का मास्टर प्लान है।
पद्मावती विवाद को लेकर जिस तरह जाति धर्म के नाम भारतीय जनमानस का ध्रूवीकरण हुआ है,वह भारत विभाजन की त्रासदी की निरंतरता है।
जाति केंद्रित वैमनस्य और घृणा धर्मोन्माद से कहीं ज्यादा भयानक है,जो भारतीय समाज में मनुस्मृति विधान के संविधान और कानून के राज पर वर्चस्व का प्रमाण है।
अफसोस यह है कि इस आत्मघाती जातियुद्ध का बौद्धिक नेतृत्व पढ़े लिखे प्रबुद्ध लोग कर रहे हैं तो दूसरी ओर बाबा साहेब भीमाराव अंबेडकर के स्वयंभू अनुयायी भी इस भयंकर जातियुद्ध की पैदल सेना के सिपाहसालर बनते दीख रहे हैं।
मिथकों को समाज,राष्ट्र और सामाजिक यथार्थ,अर्थव्यवस्था और भारतीय नागरिकों की रोजमर्रे की जिंदगी और उससे जुड़े तमाम मसलों को सिरे से नजरअंदाज करके कारपोरेट राज की निरंकुश सत्ता मजबूत करने में सत्ता विमर्श का यह सारा खेल सिरे से जनविरोधी है।
राजनीति,कारपोरेट वर्चस्व और मीडिया का त्रिशुल परमाणु बम से भी खतरनाक है तो इसे मिसाइलों की तरह जनमानस में निरंतर दागने में कोई कोर कसर समझदार, प्रतिबद्ध,वैचारिक लोग नहीं छोड़ रहे हैं और वे भूल रहे हैं कि धर्मोन्माद से भी बड़ी समस्या भारत की जाति व्यवस्था और उसमें निहित अन्याय और असमता की समस्या है तो अंबेकरी आंदोलन के लोगों को भी इस बात की कोई परवाह नहीं है।
करनी सेना और ब्राह्मणसमाज के फतवे के पक्ष विपक्ष में जो महाभारत का पर्यावरण देश के मौसम और जलवायु को लहूलुहान कर रहा है,उससे क्रोनि कैपिटलिज्म का कंपनी राज और निरंकुश होता जा रहा है।
ऐसे विवाद दुनियाभर में किसी न किसी छद्म मुद्दे को लेकर खड़ा करना कारपोरेट वर्चस्व के लिए अनिवार्य शर्त है।
मोनिका लिवनेस्की,सलमान रश्दी,पामेला बोर्डेस जैसे प्रकरण और उनकी आड़ में विश्वव्यापी विध्वंस का हालिया इतिहास को हम भूल रहे हैं।
तेल युद्ध और शीत युद्ध की पृष्ठभूमि में इन्ही विवादों की आड़ में दुनिया का भूगोल सिरे से बदल दिया गया है और इऩ्ही विवादों की वजह से आज दुनिया की आधी आबादी शरणार्थी है और दुनियाभर में सरहदो के आर पार युद्ध और गृहयुद्ध जारी है।
ईव्हीएम के करिश्मे पर नानाविध खबरें आ रही हैं।चुनाव नतीजे पर इसका असर भी जाहिर है, होता होगा।लेकिन मेरे लिए यह कोई निर्णायक मुद्दा नहीं है।क्योंकि भारत में चुनावी समीकरण और सत्ता परिवर्तन से कारपोरेट राज बदलने की कोई सूरत नहीं है।सत्तापक्ष विपक्ष में कोई बुनियादी फर्क नहीं है।कारपोरेट फंडिग से चलनेवाली राजनीति का कोई जन सरोकार नहीं है और वह कारपोरेट हित में काम करेगी। राजनीति और कारपोरेट के इसी गठबंधन को हम क्रोनी कैपिटैलिज्म कहते हैं।
गुजरात में अव्वल तो सत्ता परिवर्तन के कोई आसार जाति समीकरण के बदल जाने से नहीं है और न ऐसे किसी परिवर्तन का भारतीय कारपोरेट राज में कोई असर होना है।
सीधे तौर पर साफ साफ कहे तो राष्ट्रीय और प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट की छूट दस साल के मनमोहनी राजकाज में मिली हुई थी,कांग्रेस के सत्ता से बेदखल होने के बाद उनकी सेहत पर कोई असर नहीं हुआ है।बल्कि कंपनियों का पाल बदलने से ही कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गयी।अब जबतक उन्ही कंपनियों का समर्थन मोदी महाराज को जारी है,कोई सत्ता समीकरण उन्हें बेदखल नहीं कर सकता।
मान भी लें कि वे बेदखल हो गये तो फिर मनमोहनी राजकाज की पुनरावृत्ति से कारपोरेट राज का अंत होगा,ऐसी कोई संभावना नहीं है।कांग्रेस और भाजपा के अलावा राज्यों में जो दल सत्ता पर काबिज हैं या विपक्ष में हैं,उनमें को कोई मुक्तबाजार के कारपोरेट राज के खिलाफ नहीं है और न कोई जनता का पक्षधर है।
1991 से भारत की आर्थिक नीतियों की निरंतराता में कोई व्यवधान नहीं आाया है।डिजिटल इंडिया की मौलिक योजना कांग्रेस की रही है जैसे आधार परियोजना,कर सुधार और जीएसटी कांग्रेस की परियोजनाएं है जिन्हें भाजपा की सरकार ने अमल में लाने का काम किया है।अब भी राज्यसभा में भाजपा को बहुमत नहीं है।अब भी केंद्र में गठबंधन सरकार है।
1989 से हमेशा केंद्र में अल्पमत या गठबंधन की सरकारे रही हैं।इसी दरम्यान तमाम आर्थिक सुधार हो गये।कुछ भी सार्वजनिक नहीं बचा है।
किसानों का सत्यानाश तो पहले हो ही चुका है अब कारोबारियों का भी सफाया होने लगा है और रोजगार, नौकरियां,आजीविका सिरे से खत्म करने की सारी संसदीय प्रक्रिया निर्विरोध सर्वदलीय सहमति से संपन्न होती रही है।
इस निरंकुश कारपोरेट राज ने भारत का सामाजिक तानाबाना और उत्पादन प्रणाली को तहस नहस कर दिया है।नतीजतन भोजन, पानी,रोजगार, शिक्षा,चिकित्सा और बुनियादी जरुरतों और सेवाओं से आम जनता सिरे से बेदखल हैं।किसान जमीन से बेदखल हो रहे हैं तो व्यवसायी कारोबार से।बच्चे अपने भविष्य से बेदखल हो रहे हैं तो युवा पीढ़ियां रोजगार और आजीविका से।
सामाजिक तानाबाने को मजबूत किये बिना हम इस कारपोरेट राज का मुकाबला नहीं कर सकते।इसलिए हम किसी भी राजनीतिक पक्ष विपक्ष में नहीं हैं।
हम हालात बदलने के लिए नये सिरे से संत फकीर, नवजागरण,मतुआ,लिंगायत जैसे सामाजिक आंदोलन की जरुरत महसूस करते हैं, इन आंदोलनों के जैसे शिक्षा और चेतना आंदोलन की जरुरत महसूस करते हैं और महावनगर राजधानी से सांस्कृति आंदोलन को जनपदों की जड़ों में वापस ले जाने की जरुरत महसूस करते हैं। बाकी बचे खुचे जीवन में इसी काम में लगना है।
बहरहाल हमारे लिए सीधे जनता के मुखातिब होने का कोई माध्यम बचा नहीं है।प्रबुद्धजनों का पढ़ा लिखा तबका चूंकि सत्ता वर्ग के नाभिनाल से जुड़कर अपनी हैसियत और राजनीति के मुताबिक अपने ही हित में जनहित और राष्ट्रहित की व्याख्या करता है,तो उनपर भी हमारे कहे लिखे का असर होना नहीं हैे।
बहरहाल प्रिंट से बाहर हो जाने के बाद नब्वे के दशक से ब्लागिंग और सोशल मीडिया के मार्फत बोलते लिखते रहने का मेरा विकल्प भी अब सिरे से खत्म होने को है।
फिलहाल दो तीन महीने के लिए उत्तराखंड की तराई के सिडकुल साम्राज्य में मरुद्यान की तरह अभी तक साबुत अपने गांव में डेरा रहेगा।इसलिए कंप्यूटर,नेट के बिना मेरा लिखना बोलना स्थगित ही रहना है क्योंकि मैं स्मार्ट फोन का अभ्यस्त नहीं हूं।
पत्र व्यवाहर के लिए अब मेरा पता इस प्रकार रहेगाः
पलाश विश्वास
द्वारा पद्मलोचन विश्वास
गांव बसंतीपुर
पोस्टःदिनेशपुर
जिलाः उधमसिंह नगर,उत्तराखंड
पिनकोडः263160
