Saturday, November 26, 2016

यह बदइंतजामी और अराजकता बहुजनों के नरसंहार का चाकचौबंद इंतजाम है। करोड़ों लोगों को भूखों बेरोजगार मारने का पक्का इंतजाम करके उन्होंने संविधान दिवस मनाया और बहुजन बल्ले बल्ले हैं। पलाश विश्वास

यह बदइंतजामी और अराजकता बहुजनों के नरसंहार का चाकचौबंद इंतजाम है।

करोड़ों लोगों को भूखों बेरोजगार मारने का पक्का इंतजाम करके उन्होंने संविधान दिवस मनाया और बहुजन बल्ले बल्ले हैं।

पलाश विश्वास

अमेरिकी साम्राज्यवाद से पूरे पचास साल लड़ते हुए कामरेड फिदेल कास्त्रो का निधन हो गया।दुनिया बदलने वाले तमाम लोग अब खत्म है और इस दुनिया को बदलने की लड़ाई में अब शायद ही हमारे पास कोई है।

मनुष्यता और सभ्यता के लिए सबसे बड़ा संकट यही है कि अब कहीं कोई ऐसा इंसान पैदा नहीं हो रहा है,जिसे अपने सिवाय बाकी किसी की कोई परवाह हो या जो अपनी कौम,अपने वतन के खातिर सुपरपावर अमेरिका जैसी शक्ति से भी टक्कर ले सकें।

अजीबोगरीब हालात हैं।मुक्तबाजार में फासिज्म के राजकाज के दौर में लोग इतने डरे हुए हैं कि हिटलर की पिद्दी के शोरबे के शोर में सिट्टी पिट्टी गुम है और तमाम ताकतवर मेधासंपन्न गुणीजन शुतुरमुर्ग में तब्दील हैं।ससुरे इतने डरे हुए हैं कि लिख पढ़ नहीं सकते,बोल नहीं सकते,दर्द हो तो चीख भी नहीं सकते।हग मूत पाद नहीं सकते।इस देश का ट नहीं हो सकता।

आंखें खोल नहीं सकते कि सच देख लिया और कहीं जुबान फिसलकर सोच बोल दिया तो तानाशाह फांसी पर चढ़ा देगा।

राजनेता अपना कालाधन बचाने की जुगत में है कि अरबपति जीवनचर्या में व्यवधान न आये।

मीडिया आम जनता के हकहकूक के बारे में न बोलेगा और न लिखेगा,न देखेगा और न दिखायेगा क्योंकि कमाई बंद होने का डर है।

कलाकार बुद्धिजीवी सहमे हैं कि कहीं सात रत्नों के कुनबे से बाहर न हो जाये।

कारोबारी और उद्यमी चुप हैं कि कहीं कारोबार या उद्यम ही बंद न हो जाये।

लोग कतारबद्ध होकर बलि चढ़ने के लिए तैयार हैं।

कोढ़े खाकर भी जोर शोर से चीख रहे हैं,जय हो कल्कि महाराज।

खेती का सत्यानाश हो गया और किसान गिड़गिड़ाते हुए रहम की भीख मांग रहे हैं।

कामधंधा कारोबार रोजगार चौपट हैं तो भी करोड़ों लोग मोहलत और रहम की फिक्र में हैं।

लोगों को अपनी अपनी खाल बचाने की ज्यादा चिंता है और गुलामी की जंजीरें तोड़ने का कोई जज्बा है ही नहीं क्योंकि गुलामों को गुलामी का अहसास उस तरह नहीं है जैसे अछूत अपनी दुर्गति की वजह पिछले जन्मों का पाप मानते हैं और जो मिल रहा है,उसे किसी ईश्वर न्याय मानता है।यही उनकी अटूट आस्था है।

तंत्र मंत्र ताबीज से वे तमाम किस्मत बदलने के फेर में है और यही उसकी आस्था और धर्म कर्म है जो पिछडो़ं और अल्पसंख्यकों का भी हाल है।जादूगर के शिकंजे में है यह देश जो अपनी छड़ी घुमाकर सुनहले अच्छे दिन सबके खाते में जमा कर देगें और सारे लोग जमींदार पूंजीपति बन जायेेंगे।

अब भी यह देश मदारी सांप और जादूगर का देश है।

तकनीक अत्याधुनिक है और सभ्यता बर्बर मध्ययुगीन।

इंसानियत है ही नहीं।इंसान भी नहीं हैं।शिवजी के बाराती तमाम भूतप्रेत हैं।

आधी आबादी जो स्त्रियों की है,हजारों साल से उनके दिलो दिमाग में कर्फ्यू है और पढ़ लिखकर हैसियतें हासिल करने के बावजूद उन्हें कुछ चाहने,सोचने या फैसला करने की आजादी नहीं है और न पितृसत्ता के इस मनुस्मृति अनुशासन को तोड़ने की कोई इच्छा उनकी है।

बल्कि पितृसत्ता की पहचान और अस्मिता के जरिये वे अपना महिमामंडन करती हैं और दासी होते हुए देवी बनने की खुशफहमी में हंसते हंसते खुदकशी कर लेती हैं,दम तोड़ देती हैं या मार दी जाती हैं।जीती है तो मोत जीती है और जिंदगी से बेदखल जीती हैं।

जो औरतें ज्यादा खूबसूरत है और ज्यादा पढ़ी लिखी भी हैं,उसके साथ भी गोरी हैं,वे कभी सोच नहीं सकती कि उनकी नियति काली अछूत,पिछड़ी आदिवासी या विधर्मी औरतों से कुछ अलहदा नहीं है।

बच्चों का मां बाप उसके पैदा होते ही बेहतरीन गुलामी का सबक घुट्टी में पिलाते रहते हैं ताकि वह बागी होकर इस तंत्र मंत्र यंत्र को बदलने के फिराक में मालिकान के गुस्से का शिकार न हो जाये।मां के पेट से निकलते ही अंधी दौड़ शुरु।

ऐसे माहौल में लोग बाबासाहेब डा. बीआर अंबेडकर बोधिसत्व को याद कर रहे हैं जिनके जाति उन्मूलन के मिशन से किसी को कुछ लेना देना नहीं है।

लोग अखबारों में छपे सत्ता के इश्तेहार से गदगद हैं कि देखो,तानाशाह बाबासाहेब को याद कर रहे हैं।

बाबासाहेब की तस्वीर चक्रवर्ती महाराज की तस्वीर से छोटी है तो क्या?

तानाशाह से बड़ी किसकी तस्वीर हो सकती है जिनका कद इतिहास भूगोल और सभ्यता से बड़ा है?

अखबारी विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना जाहिर है कि नहीं है।समता और न्याय के संविधान निर्माताओं के सपने का जिक्र भी नहीं है और न उनमे से किसी का कहा लिखा कुछ है और न मूल संविधान के मसविदे से कोई उद्धरण है।

संविधान दिवस के मौके पर जो विज्ञापन हर अखबार में आया है,उसमें नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का लेखा जोखा है जो श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल में मौलिक अधिकारों की काट बतौर बंधक संसद के संविधान संशोधन के तहत आपातकाल को जायज बताने के लिए जोड़ा था।

कोलकाता के रेडरोड पर अंबेडकर मूर्ति के नीचे भी संविधान दिवस मनाया गया है।बंगाल में बसपा,रिपब्लिकन या बामसेफ जैसा कोई संगठन नहीं है लेकिन बाबासाहेब के नाम तीन लाख संगठन हैं जो अलग अलग हर साल बाबासाहेब की जयंती और उनका महानिर्वाण दिवस मनाते हैं और इस बहाने बाबासाहेब उनका एटीएम है।

तीन लाख अंबेडकरी संगठनों के बंगाल में संविधान दिवस पर तीन सौ लोग बमुश्किल थे।जिनमें यादवपुर और कोलकाता विश्वविद्यालयों के कुछ बागी छात्र भी थे और थे कुछ मुसलमान।

लालगढ़ शालबनी जैसे आदिवासी इलाकों से आदिवासी भी आये थे।धर्मतल्ला से जो जुलूस निकला उसका नेतृत्व संथाल महिलाएं पीली साड़ी में सर पर कलश रखे कर रही थीं।बाकी अछूत और पिछड़े गिनतीभर के नहीं थे क्योंकि किसी राजनीतिक नेतृत्व के संरक्षण के बिना वे हग मूत पाद भी नहीं सकते।

ऐसा गुलामों का गुलाम है यह बहुजन समाज तो समझ लीजिये कि आगे करोडो़ं लोग मारे भी जायें तो लोग इसे अपना अपना भाग्य मान लेंगे।विकास बी मान सकते हैं।यही हमारी देशभक्ति है और यही हमारा राष्ट्रवाद है कि हम नरसंहार के खिलाफ कामोश ही रहें तो बेहतर।

क्योंकि सामने से नेतृत्व करने के लिए हमारे पास कोई फिदेल कास्त्रो नहीं है।

और बाबासाहेब को तो हमने हत्यारों की कठपुतली बना दी है।

उस कठपुतली बाबासाहेब के हवाले से वे हमारा नरसंहार हमारे विकास के नाम करते रहेंगे,जायज साबित कर देंगे और हम यह मान लेगें कि बाबा साहेब की तस्वीर और मूर्ति के मालिकान कोई झूठ थोड़े ही बोल रहे हैं।

बाबासाहेब तो कुछ भी कह सकते हैं।

न हमने सुना है,न हमने देखा है और न हमने पढ़ा है।बाबासाहब की तस्वीर या मूर्ति है तो उनके हवाले से कहा सत्तापक्ष का बयान हमारा महानतम पवित्र धर्मग्रंथ है।

इस मौके पर जंगलमहल के आदिवासियों ने जल जगल जमीन से उनकी बेदखली और बेलगाम सलवाजुड़ुम की आपबीती सुनायी।

पुरखों की लड़ाई जारी रखने की कसम खायी और कहा कि वे हिंदू नहीं हैं।

उनका सरना धर्म सत्यधर्म है और उनकी संस्कृति का इतिहास भारत का इतिहास है।

उन्होंने कहा कि हमारे गीतों में सिंधु सभ्यता के ब्योरे हैं और हम पीढ़ी दर पीढ़ी उसी सभ्यता में जी रहे हैं और आर्य आज भी हमपर हमला जारी रखे हुए हैं और हमारे कत्लेआम और बेदखली का सिलसिला बंद नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि हजारों साल से हम आजाद हैं।

आदिवासियों ने कहा,हम कभी गुलाम नहीं थे और न हम कभी गुलाम होंगे।

आदिवासियों ने कहा,हमारे पुरखों ने आजादी के लड़ाई में हजारों सालों से शहादतें दी हैं और हम उनकी लड़ाई में हैं।

बेहद शर्मिंदा मेरी बोलती बंद हो गयी।मितली सी आने लगी।सर चकराने लगा कि आखिर हम कौन लोग हैं और ये कौन लोग हैं।

बिना लड़े हम हारे हुए लोग सुरक्षित मौत के इंतजार में हैं।

और इस देश के आदिवासी आजादी के लिए मरने से भी नहीं डरते।

वे किसी की सत्ता से नहीं डरते क्योंकि वे इस पृथ्वी,इस प्रकृति की संताने हैं और वे सभ्यता और इतिहास के वारिशान हैं और सबसे बड़ी बात वे हिंदू नहीं हैं।

हम हिंदू हैं तो हमें अपनी जात अपनी जान से प्यारी है।

हम हिंदू हैं तो कर्मफल मान लेना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और बाकी किसी अधिकार के हम हकदार नहीं है,ऐसा हम हजारों साल से मानते रहे हैं।

आरक्षण के बहाने और बाबासाहेब की मेहरबानी से हम तनिको पढ़ लिखे शहरी गाड़ी बाड़ी वाले और अफसर मंत्री वंत्री वगैरह वगैरह डाक्टक वाक्तर,इंजीनियर वगैरह वगैरह हो गये हैं, लेकिन हम आदिवासी नहीं है न हमारा धर्म सरणा है,जो सत्य धर्म है।

तमाम और वक्ता बोलते रहे।बाबासाहेब का गुणगान करते रहे और संविधान का महिमामंडन करते रहे।मैंने कुछ सुना नहीं है।

मेरे बोलने की बारी आयी तो न चाहते हुए हमें बोलना पड़ा।

क्या बोलता मैं?

बाबासाहेब के बारे में क्या बोलता जिनका मिशन आधा अधूरा लावारिश है और बाबासाहेब जो खुद बंधुआ मजदूर में तब्दील हैं?

उस संविधान के बारे में क्या बोलता जिसकी हत्या रोज हो रही है और हम खामोश दर्शक तमाशबीन है?

उस लोकतंत्र के बारे में क्या कहता जो अब फासिज्म का राजकाज है?

उस कानून के राज के बारे में क्या कहता जो जमीन पर कहीं नहीं है?

बाबासाहेब की वजह से बने उस रिजर्व बैंक के बारे में क्या बोलता जिसके अंग प्रत्यंग पर कारपोरेट कब्जा है?

तानाशाह के फरमान से जिसके नियम रोज बदल रहा है और जो सिरे से दिवालिया है?

उस संसदीय प्रणाली पर क्या कहता जिसके डाल डाल पात पात कारपोरेट है और जहां हर शख्स अरबपति करोड़पति है और जिनमें ज्यादातर दागी अपराधी हैं?

हम किस लोकतंत्र की चर्चा करें जिसमें हम तमाम पढ़े लिखे नागरिक दागी धनपशु अपराधियों के बंधुआ मजदूर हैं और अपनी खाल बचाने के लिए ख्वाबों में भी आजादी की सोच नहीं सकते?

बल्कि हमने वह कहा जो हमने अभीतक लिखा नहीं है।

कालाधन निकालने की कवायद से किसी को शिकायत नहीं है।

शिकायत सबको बदइंतजामी से है और अराजकता से है।

यह बदइंतजामी और अराजकता बहुजनों के नरसंहार का चाकचौबंद इंतजाम है।

आरक्षण के बावजूद कितने फीसद दलित पिछड़े आदिवासी मुसलमान और दूसरे अनार्य लोग नौकरियों में हैं?

योग्यता और मेधा होने के बावजूद बिना आरक्षण बहुजनों को किस किस सेक्टर में नीति निर्देशक बनाया गया है?कितने डीएम हैं और कितने कैबिनेट सेक्रेटरी हैं?कितने पत्रकार साहित्यकार सेलेब्रिटी है?

फिर जोड़ लें कि कितने फीसद बहुजन खेती और कारोबार में हैं और उनमें भी कितने पूंजीपति है?सत्ता वर्ग के कितने लोग किसान हैं और कितने मजदूर?

कितने फीसद बहुजनों के पास कालाधन है?

जो शहरी लोग नेटबैंकिंग और मोबाइल तकनीक के जरिये कैशलैस जिंदगी के वातानुकूलित दड़बे में रहते हैं,उनमें बहुजन कितने फीसद हैं?

यह संकट जानबूझकर सुनियोजित साजिश के तहत नरसंहारी अश्वमेध अभियान का ब्रह्मास्त्र है।

राष्ट्र के नाम संबोधन रिकार्डेड था।

सत्ता दल ने नोटबंदी से पहले सारा कालाधन अचल संपत्ति में तब्दील कर लिया।

बाकायदा कानून बनाकर पहले ही सत्ता वर्ग के तीस लाख करोड रुपये विदेश में सुरक्षित पहुंचा दिये गये।

सत्तापक्ष के तमाम पूंजीपतियों का बैकों से लिया गया लाखों करोड़ का कर्जा माफ कर दिया गया है।

अब वे डंके की चोट पर कह रहे हैं कि कैशलैस सोसाइटी बनाना चाहते हैं चक्रवर्ती महाराज कल्किमहाराज।

कैशलैस सोसाइटी के लिए बहुजनों को कौड़ी कौड़ी का मोहताज बना दिया गया।

खेती का सत्यानाश हो गया।जो कारोबार काम धंधे में थे,असंगठित क्षेत्र के मजदूर थे,ऐसे करोड़ों लोग जिनें नब्वेफीसद बहुजन हैं,बेदखलकर दिये गये हैं और वे दाने दाने को ,सांस को मोहताज हैं और आगे देश व्यापी बंगाल की भुखमरी है।मंदी है।

मुक्तबाजार के नियम तोड़कर इस कैशबंदी को कृपया बदइतजामी न कहें.यह बदइंतजामी मनुस्मृति अनुशासन का चाक चौबंद इंतजाम है।

कोरोड़ों लोगों को भूखों बेरोजगार मारने का पक्का इंतजाम करके उन्होंने संविधान दिवस मनाया और बहुजन बल्ले बल्ले हैं।

আম্বেদকরপন্থীদের সংবিধান বাঁচানোর ডাকে মিছিল

November 26, 2016 0 Comment ambedkar, indian constitution

নিজস্ব সংবাদদাতা, টিডিএন বাংলা, কলকাতা: আজ ঐতিহাসিক দিন।তবুও কেউ পথে নেই!কেবল পথে আম্বেদকরবাদীরা ও যাঁরা বাবা সাহেবকে ভালো বাসেন তাঁরা।আজ ভারতের সংবিধানের প্রতিলিপি ও জাতীয় পতাকা নিয়ে কলকাতায় মিছিল করলো একাধিক দলিত ও আদিবাসী সংগঠন।সকাল ১১টায় রানিরাসমণি থেকে এই পদযাত্রা শুরু হয়ে রেডরোড অবস্থিত বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের মূর্তির পাদদেশে শেষ হয়।

ন্যাশনাল সোশাল মুভমেন্ট অব ইন্ডিয়ার ডাকে একাধিক এসসি, এসটি, ওবিসি, আদিবাসী সংগঠন মিছিলে অংশ নেয়। বহুজন সলিডারিটি মুভমেন্টসের রাজ্য সভাপতি শরদিন্দু উদ্দীপন বলেন,"বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকর আমাদের নেতা।তিনি সংবিধান রচনা করেছেন।তিনি না থাকলে আজ এই সংবিধান পেতামনা।আজ সেই সংবিধান ধ্বংসের চেষ্টা চলছে।আমরা তাই পথে নামছি।শাসকবর্গ অসমানতা এবং বর্বরতাপূর্ণ ব্যবস্থা কায়েম করার জন্য সংসদীয় গণতন্ত্র, ভারতীয় সংবিধান এবং জনগণের বিরুদ্ধে ভয়ঙ্কর ষড়যন্ত্রে লিপ্ত হয়েছে। এরা বিশ্বের সর্বশ্রেষ্ঠ গণতন্ত্রকে মনুবাদী বিচারধারা এবং ব্রাহ্মন্যবাদী একনায়কতন্ত্র এবং ফ্যাসিবাদের যূপকাষ্ঠে বলি চড়াতে চাইছে। এদের কাজকর্মে প্রমানিত হচ্ছে যে এই অমানবিক পুঁজিবাদ–ব্রাহ্মন্যবাদ দেশদ্রোহী গাটবন্ধন ভারতীয় সংবিধানকে নিজেদের কব্জায় নিয়ে ফেলেছে।

এমন বিকট পরিস্থিতিতে ভারতের একজন গণতন্ত্র প্রেমী সচেতন নাগরিক হিসেবে সংবিধান তথা সংসদীয় গণতন্ত্র বাঁচানোর জন্য সর্বশক্তি নিয়ে এগিয়ে আসা প্রয়োজন।"

আদিবাসীদের সাংস্কৃতিক আয়োজন সকলের প্রসংসা কুড়িয়েছে।উপস্থিত আম্বেদকরপন্থীরা সংবিধানের প্রস্তাবনা পড়েন এবং নতুন দেশ গঠনের প্রতিজ্ঞা করেন।তবে আদিবাসীদের অভিযোগ,"নিজেদের মৌলিক অধিকার নিয়ে আন্দোলন করলেই মাওবাদী বলা হচ্ছে।আমরা চরম সমস্যার মধ্যে আছি।"

শরদিন্দু বাবুর আরও বলেন,"ভারতের সংবিধান গণতন্ত্রের ইতিহাসে সর্ববৃহৎ এবং সর্বশ্রেষ্ঠ সংবিধান।ভারতের সংবিধানের ভিত এমন ভাবে গড়ে তোলা হয়েছে যে যাতে প্রত্যেক নাগরিক নিজ নিজ ক্ষেত্রে অর্থনৈতিক, সামাজিক, ধর্মীয়, বৌদ্ধিক ও সাংস্কৃতিক স্বাধীনতা উপভোগ করতে পারে। এই সংবিধান দেশের প্রত্যেক নাগরিককে ধর্ম, জাতি, লিঙ্গ, ভাষা এবং আঞ্চলিকতার উর্দ্ধে এসে সদ্ভাবনার সাথে জীবন অতিবাহিত করার মৌলিক অধিকার প্রদান করেছে।

কিন্তু অত্যন্ত বেদনার সাথে জানাচ্ছি যে, দেশে একটি ফ্যাসিবাদী শক্তি কায়েম হওয়ার পরে প্রতিনিয়ত এই সংবিধানের অবমাননা চলছে।"

মিছিল শেষে বক্তব্য রাখেন কর্নেল সিদ্ধার্থ ভার্বে, সুরেশ রাম, শিরাজুল ইসলাম, সানাউল্লা খান, পলাশ বিশ্বাস, সিদ্ধানন্দ পুরকাইত, সুচেতা গোলদার, কৃষ্ণকান্ত মাহাত,প্রশান্ত বিশ্বাস প্রমুখ।

মিছিলের আয়োজকদের দাবি,কলকাতায় আম্বেদকরের যে মূর্তি আছে তাতে বেশ কিছু 'ভুল' আছে।বাবা সাহেবের চোখে চশমা নেই।আরও কিছু ভুলের সংশোধন চেয়ে মুখ্যমন্ত্রী ও রাজ্যপালের সাথে দেখা করবেন তাঁরা।

জাতীয় পতাকা হাতে সংবিধান দিবস পালন করলেন পশ্চিমবঙ্গের দলিত বহুজন মানুষঃ

আজ সকাল ১১টার সময় থেকে ন্যাশনাল সোস্যাল মুভমেন্ট অব ইন্ডিয়ার আহ্বানে কোলকাতার রানিরাসমণি রোড থেকে শুরু হয় সংবিধান বাঁচাও শিরোনামে একটি পদযাত্রা। এই পদযাত্রায় অংশগ্রহণ করেন পশ্চিমবঙ্গের সর্ব ধর্মের মানুষ। মিছিল থেকে আওয়াজ ওঠে, "যদি আগামী শিশুদের ভবিষ্যৎ বাঁচাতে চাও, সংবিধান বাঁচাও"।

সংবিধান দিবসে আগত সমস্ত মানুষ ফোর্টউইলিয়ামের পাশে অবস্থিত বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের মূর্তির পাদদেশে ভারতীয় সংবিধানের প্রস্তাবনা পাঠ করেন এবং শপথ গ্রহণ করেনে। অনুষ্ঠানের আকর্ষণ বাড়িয়ে তোলেন পশ্চিম মেদিনীপুর থেকে আগত আদীবাসী ভাইবোনেরা। তার সড়পা নৃত্যের মাধ্যমে মারাংবুরু এবং বাবা সাহেবকে বন্দনা করেন।



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महत्वपूर्ण खबरें और आलेख मारे जायेंगें देश के आम नागरिक, नोटबंदी नहीं, यह मृत्यु महोत्सव है!


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Friday, November 25, 2016

नोटबंदी नहीं,यह मृत्यु महोत्सव है! मारे जायेंगें देश के आम नागरिक क्योंकि तमाम रंगबिरंगे अरबपति राजनेता मुक्तबाजार के कारिंदे हैं और उन्हें इस देश की जनता से कोई मुहब्बत नहीं है। #BankruptRBI #BnakruptIndianbanking #Nobanktorefusepaymentworldwide #IndialivesonPayTMBigBazarAirtel #PoliticalsystemconvertedintoBlackhole #MultipleorganfailureculminatinginfamineandslumptoaccomplishtheHindutvaagendaofmassdestruction पलाश विश्वास

नोटबंदी नहीं,यह मृत्यु महोत्सव है!

मारे जायेंगें देश के आम नागरिक क्योंकि तमाम रंगबिरंगे अरबपति राजनेता मुक्तबाजार के कारिंदे हैं और उन्हें इस देश की जनता से कोई मुहब्बत नहीं है।


#BankruptRBI

#BnakruptIndianbanking

#Nobanktorefusepaymentworldwide

#IndialivesonPayTMBigBazarAirtel

#PoliticalsystemconvertedintoBlackhole

#MultipleorganfailureculminatinginfamineandslumptoaccomplishtheHindutvaagendaofmassdestruction

पलाश विश्वास

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में नोटबंदी को क़ानूनन चलाई जा रही व्यवस्थित लूट की संज्ञा दी है।

डा.मनमोहन सिंह मुक्तबाजार के मौलिक ईश्वर हैं और अर्थशास्त्र वे हमसे बेहतर जानते हैं भले ही कल्कि महाराज और उनकी अर्थक्रांति के बगुला विशेषज्ञ का अर्थशास्त्र उनसे बेहतर हो।

माननीय ओम थानवी ने कल फेसबुक पर टिप्पणी की है कि पुराना पाप उनका धुल गया है।लेकिन उनका पाप इतना बड़ा है कि तमाम ग्लेशियर पिघलकर गंगाजल बनकर भी उसे धो नहीं सकता।वे संसद में जो बोले,वह दरअसल मुक्तबाजार का व्याकरण है।जो सौ टका सही है।

दुनिया में सचमुच ऐसा कोई देश नहीं है जहां बैंक करदाताओं और ग्राहकों कोमना कर कर दें।भुगतान न कर पाने की स्थिति दिवालिया हो जाना है।नोटबंदी ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को दिवालिया बना दिया है।

सिर्फ मनमोहन सिंह ही नहीं,तमाम रेटिंग एजंसियां विकास दर में कमी की आसंका जता चुके हैं।कृषि उत्पादन ठप है।औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है।मुद्रा का लगातार अवमूल्यन हो रहा है।अब बेदखल हुआ बाजार भी नोटबंदी की वजह से बंद है।बाजार की गतिविधियां इसी तरह ठप रही और डिजिटल देश का नानडिजिटल बहुसंख्या जनता अगर उत्पादन प्रणाली,अर्थव्यवस्था और बाजार से बाहर कर दिये जाये तो यह दिनदहाड़े डकैती नहीं है।डकैती के बावजूद अर्थव्यवस्था,उत्पदन प्रणाली और बाजार की गतिविधियां ठप नहीं पड़े जाती।

देश के नागरिकों से उनकी क्रय क्षमता रातोंरात छिनकर कल्कि महाराज ने मुक्तबाजार को ही बाट लगा दी है और यह नोटबंदी मुक्त बाजार के व्याकरण के खिलाफ है।डा.मनमोहन सिंह का कहना कुल मिलाकर यही है।

सारी बुनियादी सेवाएं और बुनियादी जरुरतें जब आपकी क्रय क्षमता से जुड़ी हैं तो वह क्रयक्षमता छिन जाने से आप हवा पानी भी खरीदने की हालत में नहीं हैं और राशन पानी दूर की कौड़ी है।पूरा देश अब गैसत्रासदी के शिकंजे में हैं।

एक मुश्त खेती,कारोबार और बाजार को ठप करने का एक ही नतीजा है और वह है मौत जिसका भुगतान बैंकों की नकदी प्रवाह की तरह आहिस्ते आहिस्ते होगा।

कतारों में खड़े कुछ लोगों को नकद भुगतान जरुर हो गया है लेकिन जो अपने घरों में बीवी बच्चों,मां बाप बहन के साथ तिल तिल तड़प तड़प कर मरने को अभिशप्त हैं,उनकी लाशों की गिनती कभी नहीं होने वाली है।

पिछले सत्तर सालों से भारत के देहात में किसान सपरिवार इसीतरह मरते खपते रहे हैं और बाकी देश ने तनिको परवाह नहीं की।

आजादी के बाद से आदिवासियों की बेदखली जारी है।उनका कत्लेआम जारी है।प्राकृतिक संसाधनों की इस खुली लूट और सैन्य राष्ट्र के सलवा जुड़ुम का बाकी देश समर्थन करता है।

कश्मीर और मणिपुर में सैन्य शासन और दमन का भी राजनेता विरोध नहीं करते।न आदिवासियों,दलितों, पिछडो़ं,अल्पसंख्यकों और स्त्रियों के कत्लेआम की कोई परवाह है उन्हें,जबतक न वोटबैंक राजनीति इसके लिए उन्हें मजबूर न कर दें।

बिग बाजार कोई बैंक नहीं है।उसे बैंकिंग की इजाजत है।पेमेंट बैंकिगं अलग हो रही है।ईटेलिंग के अलावा अब कोई विकल्प बचा नहीं दिखता।

दूसरी ओर,चौतरफा खरीदारी के इस माहौल में भी आज पीएसयू बैंकों की पिटाई देखने को मिल रही है। निफ्टी का पीएसयू बैंक इंडेक्स 0.12 फीसदी की कमजोरी के साथ कोरोबार कर रहा है।

पेटीएम के अलावा नकदी कहीं नहीं है।ऐसे हालात में देहात और कस्बों से लेकर महानगरों तक किराना दुकानदारों से लेकर फलवालों,रेहड़ीवालों,फुटपाथवालों, हाकरों,सब्जी मछलीवालों का सारा कारोबरा अब शापिंग माल में चला गया है।

छह महीन तक नकदी का संकट नहीं सुलझा तो इनके पास कारोबार चलाने लायक पैसा भी नहीं बचेगा।खुदरा बाजार में कितने लोग हैं,कल्कि महाराज इसका कोई सर्वे करा लेते तो बेहतर होता।

एटीएम और बैंकों से लाशें बहुत कम निकलने वाली है जाहिर है।खेत खलिहानों, कारखानों और खुदरा बाजार,चायबागानों से लाशों का जो जुलूस निकलने वाला है,उनमें नौकरीपेशा लाशें भी कम नहीं निकलेंगी।एकाधिकार पूंजी सारी नौकरियां का जायेंगी।

नोटबंदी नहीं,यह मृत्यु महोत्सव है।

अकेले बंगाल के 300 चाय बागानों के करीब पांच लाक मजदूरों को उनकी दिहाड़ी नहीं मिल रही है।खेत मजदूरों और असंगठित क्षेत्र के करोडो़ं लोग यकबयक बेरोजगार हो गये हैं और हाट बाजार में खुदरा दुकानदारों का कारोबार ठप हैं।

किसान न खेत जोत पा रहे हैं न बीज बो पा रहे हैं।फसल तैयार है तो उसे बेच भी नहीं पा रहे हैं।

अब आगे भुखमरी है जो मंदी की वजह से और भयंकर होगी।आटा चाल दाल तेल सबकुछ मंहगा हो रहा है और आय के सारे साधन खत्म हो रहे हैं।

लोगों के हाथ पांव तो एकमुश्त काट ही लिये गये है।उनके दिलोदिमाग और एक एक अंग प्रत्यंग बेदखल हैं।

अब वे सीना ठोंककर कहने लगे हैं कि वे डिजिटल इंडिया बना रहे हैं और नोटबंदी का मकसद दरअसल कैशलैस सोसाइटी है।

कालाधन निकालने का मकसद वे खुद गलत बताने लगा है।

अपनी सिरजी आपदा को लंबे अरसे तक जारी रखकर वे एकाधिकार पूंजी केहवाले कर रहे हैं सबकुछ और आम जनता की तकलीफों,उनकी जिंदगी और मत की उन्हों कोई परवाह नहीं है।

अब 28 नवंबर को नोटबंदी के खिलाफ भारत बंद है।इस बारे में आदरणीय मोहन क्षोत्रियकी टिप्पणी लाजबाव है।उन्होने लिखा हैः

दुकान बंद हो जाती है तो लगता है भारत बंद है ,

दुकान खुली रहती है तो लगता है भारत खुला है l

बाबा को व्यापारी और व्यापारी को बाबा बनाने की नीति के बारे में सोचिये l

अब दुकानदारों को सोचना है कि भारत बंद रहेगा या खुला l

भारत तो अब 8 नवंबर से बंद ही है।सारी जनता काम धंधा बंद करके एटीएम,बैंक से लेकर बिग बाजार के सामने कतारबद्ध है।एक एक करके उत्पादन इकाइयां बंद है।असंगठित क्षेत्र में नकदी के अभाव के चलते कोई काम नहीं है।

शापिंग माल के अलावा सारा खुदरा कारोबार मय किराना साग सब्जी फल मछली अनाज हाट बाजार राशन पानी घर का चूल्हा सारा कुछ बंद है और आम जनता इसतरह केसरिया फौज हैं कि उनकी तबीयत हरी हरी है।

सावन के अंधे को सारा कुछ हरा हरा नजर आता है।कहीं किसी प्रतिरोध की सुगबुगाहट नहीं है।लोग कतार में खड़े खड़े मर रहे हैं।

लाशें निकल रही हैं एटीएम और बैंकों से।

दुनिया में भारत पहला देश है जहां नकद जमा होने के बावजूद करदाताओं और ग्राहकों को धेला भी नहीं मिल रहा है।

रोज दिहाड़ी नहीं मिल रही है।चूल्हा सुलगाने के लिए दिल्ली दरबार से रोज नये फरमान जारी हो रहे हैं।रिजर्व बैंक के नियम रोज बदल रहे हैं।

सारे बैंकों और एटीएम पर नो कैश की तख्ती टंगी है और हाट बाजार के साथ साथ काम धंधे से लोग बेदखल हो रहे हैं।

जलजंगलजमीन नागरिकता से वे पहले ही बेदखल हैं।

कानून बदलकर पूंजीपतियों के तीस लाख करोड़ देश से बाहर निकालने के बाद नोट बंदी हुई है जिसकी गोपनीयता का आलम अब बेपर्दा है क्योंकि राष्ट्र के नाम वह ऐतिहासिक भाषण लाइव नहीं था।पहले से जो रिकार्डिंग की गय़ी थी,उस संबोधन की गोपनीयता की भी बलिहारी।

जिन क्षत्रपों ने राजनीतिक गोलबंदी के लिए पहल की है,कमसकम वे कल्कि महाराज के विकल्प नहीं है क्योंकि आम जनता को उनके कारनामे और तमाम किस्से मालूम है।वे अपने अपने हिस्से के कालाधन बचाने की जुगत लगा रहे हैं और कुल मिलाकर उन्हें शिकायत यही है कि संघियों और भाजपाइयों ने तो अपना कालाधन सफेद कर लिया,लेकिन उन्हें कोई मोहलत नहीं मिली है।

इसीलिए हिंदुत्व एजंडे के संघियों से भी बड़े झंडेवरदार शिवसेना के सारे अंग प्रत्यंग नोटबंदी के खिलाफ चीख पुकार मचाने लगे हैं।

इस राजनीतिक गोलबंदी से बदलेगा कुछ भी नही।

आधार परियोजना से लेकर तमाम आर्थिक सुधारों के नरमेधी अश्वमेधी अभियान के रंगबिरंगे सिपाहसालार एकजुट होकर आगामी चुनाव में सत्ता पर काबिज होने की जुगत लगा रहे हैं और यूपी पंजाब के चुनाव के बाद पता भी चल जायेगा कि इसका नतीजा क्याहोने वाला है।

1991 के बाद से लगातार हो रहे सत्ता परिवर्तन से लगातार आम जनता के सफाया का कार्यक्रम जारी है जो हर सत्ता बदल के बाद तेज से तेज होता जा रहा है,जो हिंदुत्व का विशुध पतंजलि ग्लोबल एजंडा है।

मुक्तबाजार के पहरुओं से जनांदोलन की उम्मीद लगाना बेवकूफी के अलावा कुछ नहीं है।ये तमाम लोग समता और न्याय के किलाफ रंगभेदी वर्ण वर्चस्व और अस्मिता गृहयुद्ध के महारथी हैं।

जनविद्रोह जो आजादी तक लगातार जारी रहा है,उसका सिलसिला भारत विभाजन के बाद थम गया है।

जमींदारियों और रियासतों के वारिशान ने सत्ता में साझेदारी के तहत देश के तमाम संसाधनों पर कब्जा कर लिया है और मिलजुलकर वे देश बेच रहे हैं।

हिस्सेदारी की लड़ाई बाकी है।

सलवा जुड़ुम के खिलाफ कोई नहीं बोल रहा है।फर्जी मुठभेडों के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठा रहा है।

सैन्य दमन के पक्ष में हैं सारे के सारे और रंगभेदी युद्धोन्माद इन सभी का राष्ट्रवाद है क्योंकि वे अइपनी जमींदारी और रियासत बचाने में लगे हैं।

देश की राजनीति आम जनता के लिए ब्लैकहोल है।

यह सुरसामुखी राजनीति सबकुछ हजम कर जाने वाली है।

मारे जायेंगें देश के आम नागरिक क्योंकि तमाम रंगबिरंगे अरबपति राजनेता मुक्तबाजार के कारिंदे हैं और उन्हें इस देश की जनता से कोई मुहब्बत नहीं है।

इसी बीच टाटा ग्रुप के कार्यकारी चेयरमैन रतन टाटा ने नोटबंदी पर ट्वीट किया है। उन्होंने कहा है कि नोटबंदी के कारण जनता को काफी दिक्कत हो रही है। खासकर इलाज कराने में ज्यादा परेशानी हो रही है। कैश की कमी के कारण गरीबों को रोजमर्रा की चीजें नहीं मिल रही हैं। सरकार अपनी तरफ से नए नोट मुहैया कराने की पूरी कोशिश कर रही है लेकिन अभी वैसी राहत की जरूरत है जैसी राष्ट्रीय आपदा के समय होती है।

सीएनबीसी-आवाज़ को सूत्रों से मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के मुताबिक सरकार कालेधन वालों को 2 विकल्प दे सकती है। बताया जा रहा है कि पहले विकल्प के तौर पर 60 फीसदी टैक्स और पेनाल्टी जमाकर चिंतामुक्त हो सकते हैं। वहीं दूसरे विकल्प के तौर पर 50 फीसदी टैक्स के साथ 4 साल के लॉक-इन पीरियड के जरिए राहत मिल सकती है।

सूत्रों का कहना है कि सरकार ने अघोषित आय पर 2 नए विकल्पों के प्रस्तावों को मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेज दिया है। इन विकल्पों में गोल्ड होल्डिंग सीमा तय करने की योजना नहीं है। लेकिन, बैंक में अघोषित आय जमा करने पर 50 फीसदी टैक्स और 4 साल का लॉक-इन पीरियड लागू हो सकता है। साथ ही बैंक में अघोषित आय जमा करने पर 60 फीसदी टैक्स और पेनाल्टी लागू हो सकता है।

इस बीच नोटबंदी का आज 17वां दिन है। विपक्षी दल चाहते हैं कि सरकार इस फैसले को वापिस ले जबकि पीएम नरेंद्र मोदी का कहना है कि जनता उनके साथ है इसलिए वे अपना फैसला वापिस नहीं लेंगे। वहीं लोकसभा और राज्यसभा में आज भी जोरदार हंगामा हुआ। राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों ने पीएम को बुलाने की मांग के साथ फिर हंगामा किया। विपक्षी दलों ने पीएम से अपने बयान पर माफी मांगने की मांग की जिसमें पीएम ने कहा था कि विपक्ष को हमारी तैयारियों से दिक्कत नहीं हैं बल्कि नोटबंदी के ऐलान ने उन्हें तैयारी करने का मौका नहीं दिया इसलिए वो भड़के हैं।

नोटबंदी के मुद्दे पर शुक्रवार सुबह विपक्ष ने आते ही राज्य सभा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर हमला बोला। विपक्ष ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि नोटबंदी के मुद्दे पर पीएम मोदी सड़कों पर खूब बोलते है लेकिन संसद में उसी बात को बोलने में क्यों डर रहे हैं। बता दें इससे पहले विपक्ष की मांग पर प्रधानमंत्री गुरुवार को राज्यसभा में बहस के दौरान मौजूद रहे लेकिन वे इस मुद्दे पर एक शब्द भीनहीं बोले। विपक्ष नोटबंदी के मुद्दे पर संसद में बहस के दौरान प्रधानमंत्री की लगातार मौजूदगी की मांग कर रहा है। आज भी इस मुद्दे को लेकर राज्यसभा में विपक्ष हंगामा किया।

आजतक के मुताबिक नोटबंदी को लेकर संसद में हंगामा जारी है. शुक्रवार सुबह 11 बजे से लोकसभा-राज्यसभा की कार्यवाही शुरू हुई. राज्यसभा में विपक्षी सदस्यों ने पीएम को बुलाने की मांग के साथ फिर हंगामा किया, जिसके बाद सदन को 2.30 बजे तक स्थगित कर दिया गया. वहीं हंगामे के चलते लोकसभा को 28 नवंबर तक स्थगित कर दिया गया है. इस बीच कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि मोदी जी पहले हंस रहे थे, फिर रोने लगे.

जनसत्ता में हमारे पूर्व संपादक ओम थानवी के मुताबिक मोदी और उनके भक्त आपस में नोटबंदी "सर्वे" की बधाई बाँट रहे हैं, हक़ीक़त यह है कि लोग त्राहिमाम-त्राहिमाम कर उठे हैं। यह होना ही था। रिज़र्व बैंक की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में 16.4 लाख करोड़ के नोट चलन में हैं। इनमें 38.6 प्रतिशत 1000 के नोट हैं, 47.8 प्रतिशत 500 के। अर्थात् देश की 86 प्रतिशत से ज़्यादा की मुद्रा को बग़ैर बदलवाए उसका 'धारक' इस्तेमाल नहीं कर सकता।

इसे किसी ने बेहतर उपमा यों दी है - आप अगर किसी के शरीर से 86 प्रतिशत ख़ून निकाल दें, तो उसका Multiple Organ Failure होना लाज़िमी है।

पर इस बात को देश के स्वनामधन्य "सर्जन" को कौन समझाए? उनके इर्द-गिर्द चापलूसों की भीड़ है, जैसे इंदिरा गांधी के गिर्द हुआ करती थी। ख़ासकर इमरजेंसी के "अनुशासन पर्व" के बाद।

राजनीति और राजनेताओं की साख के मद्देनजर ही हमारे गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी ने लिखा हैः

जस अम्बानी तस पेटीएम.

भाई पलाश! अभी गहराई से देखते रहो. राजनीतिक दलों की हाय तोबा तो अपने कालाधन पर खतरे के कारण है. कम से कम नोट्बन्दी के इस दर्द के सहते हुए भी आम जन के चेहरे पर उम्मीदों की लाली देख रहा हूँ क्या साम्यवाद या समाजवाद के झंडा बरदारों ने आम जनता में भीतर ही भीतर में पनप रहे इस आक्रोश को वाणी व देने ाका प्रयास किया.. हिन्दूवाद का घोर विरोधी होते हुए भी मैं अभी इस मामले में मोदी के साथ हूँ. 'अभी" शब्द पर भी ध्यान दें

रौतेला जी! जुगाड़ और कथनी और करनी में अन्तर ही भारतीय संस्कृति की आत्मा है. यही उपनिषदों के तवत्तिष्ठति दशांगुलम का सार है.( वह उससे ( हर विधान से) दस अंगुल आगे है) मौका लगने पर हम भी कहाँ पीछे रहने वाले हैं. जनधन खातों में इक्कीस हजार करोड़ की माया आ गयी है. महाभारत है मित्र! जो जुए में पत्नी को भी दाँव पर लगा दे वह धर्मराज, जिसके लिए लक्ष्य प्राप्ति के लिए नीति और अनीति में कोई फर्क ही न हो केवल गीता का उपदेश दे. जो ्नियम से चलने का प्रयास कर उस राम को १२ कलाओं का अवतार माना जाय और जो आज के अर्थों में चालू हो ( कृष्ण)वह १६ कलाओं का अवतार. सब लीला है.

ललित सती ने अपने फऱेसबुकवाल पर खूब लिखा हैः

- बाकी पार्टियों ने 2014 में काले धन से चुनाव लड़ा, हमने 10 हजार करोड़ रुपया अनुलोम-विलोम करके उत्पन्न कर लिया, बस उत्ते से पैसे से काम चला लिया। एक कानी कौड़ी ब्लैक मनी नहीं हमारे पास

- कैसे-कैसे भ्रष्टाचारी, दुराचारी, देशद्रोही दूसरी पार्टियों में भरे पड़े हैं। हमारे यहाँ एक नहीं। हमारे यहाँ जो आता है हम उसके कान में एक मंत्र फूँक देते हैं, वह तत्काल प्रभाव से सदाचारी, पक्का राष्ट्रभक्त हो जाता है

- स्कैम, घोटाला जैसा कोई शब्द हमारी डिक्शनरी में कहीं नहीं है। हमने उन्हें अपनी भाषा से बहिष्कृत कर दिया। भ्रष्टाचार शब्द ही नहीं रहेगा तो भ्रष्टाचार का वजूद कैसा। हम यज्ञ और उत्सव की परंपरा वाले हैं। व्यापमं यज्ञ, विमुद्रीकरण उत्सव आदि

- कांग्रेस ने कैसी देश विरोधी नीतियाँ लागू कर रखी थीं, देशी-विदेशी लुटेरों की मौज आई हुई थी। हमने सारी नीतियों को शंख फूँककर अपना बना लिया, वे अब राष्ट्रवादी हो गईं। अवतार के तेजोमयी प्रकाश में लुटेरों का हृदयपरिवर्तन हो गया, वे अब देशसेवक हो गए। बला के जादूगर हैं हम

.... और भी बहुत बहुत कुछ हैं हम। बताएँगे नहीं। हमारा मातृसंगठन भी बहुत कुछ नहीं बताता है। उसने आज तक नहीं बताया कि आजादी की लड़ाई में कहाँ थे हम। हालाँकि अब समय आ गया है अपने इतिहासकारों से लिखवाएँगे कि कहाँ थे हम। नये सत्य गढ़ने के पारंगत जो हैं हम।

'नोटबंदी क़ानूनन चलाई जा रही व्यवस्थित लूट'

साभार बीबीसी हिंदी

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में नोटबंदी को क़ानूनन चलाई जा रही व्यवस्थित लूट की संज्ञा दी है.

संसद में कई दिनों तक नोटबंदी के मामले में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच हुई हंगामें के बाद राजयसभा में नोटबंदी पर बहस शुरू हुई है.

मनमोहन सिंह ने अपने भाषण में ये 6 अहम बातें कहीं-

1. मैं नोटों को रद्द किए जाने के उद्देश्यों से असहमत नहीं हूं, लेकिन इसे ठीक तरीके से लागू नहीं किया गया.

2. पीएम बताएं ऐसा कौन सा देश है जहाँ लोग बैंक में पैसा जमा करा सकते हैं लेकिन अपना पैसा निकाल नहीं सकते हैं.

3. लॉन्ग रन या लंबे समय में असर की बात हो तो उस अर्थशास्त्री की बात याद करें - दीर्घकाल में तो हम सब मर चुके होंगे.

4. असर क्या होगा मुझे नहीं पता. इससे लोगों का बैंकों में विश्वास ख़त्म होगा. जीडीपी में 2 पर्सेंट की गिरावट आ सकती है.

5. इससे छोटे उद्योगों और कृषि को भारी नुकसान का सामना करना पड़ेगा.

6. बैंक हर दिन नियम बदल रहे हैं जिससे लगता है कि पीएमओ और रिज़र्व बैंक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं.

मनमोहन सिंह के बाद राज्यसभा में बोलते हुए समाजवादी पार्टी सांसद नरेश अग्रवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री, अहंकार हमेशा अंधकार की ओर ले जाता है. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था तो उन्हें भी लगता था जनता इस फ़ैसले से खुश है लेकिन चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. अग्रवाल ने कहा कि पीएम मोदी को भी ऐसा ही लगता है कि लोग खुश हैं पर आनेवाले चुनाव में उन्हें पता चल जाएगा.

बहुजन समाजवादी पार्टी चीफ़ मायावती ने भी कहा कि उनकी पार्टी नोटों को रद्द करने के ख़िलाफ़ नहीं है लेकिन इसे लागू करने का तरीका सही नहीं है. उन्होंने कहा कि लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मायावती ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वह सदन में मौजूद रहें.