Sayan Bhattacharjee
আজ সিঙ্গুর মামলার ঐতিহাসিক রায় আমায় খুশী করলেও এই নৃশংস ঘটনাটা আমায় পুরোপুরি নাড়িয়ে দিয়ে গেল .
..বাঙালির সম্পূর্ণ ভূগোল,ইতিহাস,সংস্কৃতি,সাহিত্য, শিল্প,অর্থ,বাণিজ্য,বিশ্বায়ণ,রুখে দাঁড়াবার জেদ, বৌদ্ধময় ঐতিহ্য, অন্ত্যজ ব্রাত্য বহিস্কৃত শরণার্থী জীবন যাপনকে আত্মপরিচয়,চেতনা,মাতৃভাষাকে রাজনৈতিক সীমানা ডিঙিয়ে আবিস্কার করার প্রচেষ্টা এই ব্লগ,আপনার লেখাও চাই কিন্তু,যে স্বজনদের সঙ্গে যোগাযাগ নেই,তাঁদের খোঁজে এই বাস্তুহারা তত্পরতা,যেখবর মীডিয়া ছাপে না, যারা ক্ষমতার, আধিপাত্যের বলি প্রতিনিয়তই,সেই খবর,লেখা পাঠান,খবর দিন এখনই এই ঠিকানায়ঃpalashbiswaskl@gmail.com
..इंद्रेश मैखुरी
उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान 1994 में आज ही के दिन-1 सितम्बर को खटीमा में जघन्य गोलीकांड हुआ,जिसमे 7-8 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी.शांतिपूर्ण तरीके से जुलूस निकाल रहे लोगों पर गोली चलाना एक बर्बर कृत्य था.लोगों के अहिंसक आन्दोलन को भी तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार ने बेहद क्रूर तरीके से निपटने का रास्ता चुना ,जिसमें लोगों के हताहत होने का सिलसिला खटीमा से शुरू हो कर मसूरी,मुजफ्फरनगर तक जारी रहा.राज्यपाल का शासन हुआ तो श्रीयंत्र टापू गोलीकांड हुआ.एक आजाद देश में लोकतान्त्रिक तरीके से अलग राज्य की मांग की कीमत हमने 40 से अधिक शहादतों के रूप में चुकाई.हैरत यह है कि इन जघन्य हत्याकांडों के घटित होने के 22 वर्षों के बाद भी हम न्याय का इन्तजार कर रहे हैं.इसी बीच में जिसके लिए ये शहादतें हुई, वह राज्य भी अस्तित्व में आ चुका है.लेकिन पिछले 15 सालों में कांग्रेस-भाजपा के बारी-बारी सत्ता में आने के चक्रानुक्रम के साथ जैसा राज्य बना है,क्या ऐसे राज्य के लिए तमाम शहादतें और कुर्बानियां थी? जमीन,शराब और खनन के माफिया के वर्चस्व वाले,नेताओं-नौकरशाहों के भ्रष्टाचारी गठबंधन वाले,राज्य को देख कर तो ऐसा नहीं लगता कि ऐसे जनता के हितों पर कुठाराघात करते राज्य के लिए किसी को भी शहीद होना चाहिए.हत्याकांडों के शहीदों के लिए न्याय मांगते हुए ऐसा लगता है कि उन शहीद हुए लोगों और राज्य के लिए लड़ने वालों को, सिर्फ हत्याकांडों के लिए ही न्याय नहीं चाहिए,बल्कि जैसा राज्य बन गया है,उसका इन्साफ किये जाने की भी दरकार है.
সকালের দিকের ব্রেকিং নিউজ বিকেলের খবরের তোড়ে হারিয়ে যায়। বিকেলে যা ঘটেছে ঐতিহাসিক। সকালে খাল থেকে তোলা ১২ বছরের ধর্ষিতার মৃতদেহটি ঐতিহাসিক নয় কারণ কলকাতার লোকের বাম অঙ্গ ডান অঙ্গ দুইই পড়ে গেছে বহুদিন ধরেই ।
দিল্লি যেভাবে নির্ভয়ার জন্য নেমেছিল সেভাবে আর কলকাতাবাসী নামতে পারে না।
अब तो टिहरी का घंटाघर भी नहीं बचा है
अरुण कुकसाल
'पलायन एक चिंतन अभियान' के तहत 14-15 अगस्त, 2016 को कोटी-कनसार में 'पहाड़: संस्कृति, साहित्य और लोग' गोष्ठी से इतर-
क्षम्य है, उदार है,
सरल, सदाबहार है,
षान्त, सौम्य, दत्तचित,
ये वृक्ष देवदार है।
-सुभाष तराण
कनसार, डाक बंगले की बाहरी दीवार पर इसके बनने का सन् 1898 लिखा है। और डाक बंगले के बैठक कक्ष में ये कविता पोस्टर कल ही आया है। पर मन कहता है, नहीं, ये कविता तो सन् 1898 और उससे भी आदि समय से यहीं विराजमान है। ये कविता इस बात की गवाह है कि पिछले 118 सालों सेे ये देवदार के पेड इस बंगले की सुरक्षा में अनवरत मुस्तैद खड़े हैं। देवदार के पेडों से निनारूओं के समवेत स्वर भोर, दोपहर और सांय इस कविता का गायन करते हैं।
मसूरी-षिमला पैदल मार्ग के हर 5 पांच किमी. के दायरे में अंग्रेजों ने डाक बंगले बनाये। और हम क्या चीज हैं कि आज उन डाक बंगलों की मरम्मत करने की सार्मथ्य भी नहीं है, हमारे पास। पर मंत्री जी रुकेगें तो डाकबंगलों में ही। हनक और धमक खोखली ही सही, दिखाने में क्या जाता है। एक बार सोचो तो, उत्तराखण्ड में अंग्रेजों की बनायी सारी इमारतों को एक तरफ रख दें तो हमारे पास....... अब तो टिहरी का घंटाघर भी नहीं बचा है।
जब भी डाकबंगले में कोई जलसा होता है, बुर्जुग षम्सी गूजर को खबर हो जाती है। वह भोर में दूध ले कर हाजिर हो जाता है। इलाका क्या यहां के चप्पे-चप्पे से वह वाकिफ है। पैदाइष ही यहीं हुयी। परदादा की उंगली पकड़कर सहारनपुर से इस ओर आना-जाना जो षुरू हुआ अब उसके नाती-पोतों तक उसी लय-ताल से जारी है। गूजरों के 500 से ज्यादा पषु पल रहे हैं, कोटी-कनसार के जंगलों में। हम पहाड़ियों की तरह दन्न बनकर फल देने जाड़ों में मैदान चले जायेगें। वो तो फिर गरमी की आहट होते ही वापस आते हैं। हम पहाड़ी गए तो गए ऊपर से जीवन भर गरियायेगें पहाड़ को।
सुबह के नाष्ते में समय लग रहा है। पर बातचीत का नाष्ता षुरू हो चुका। मित्रों में बहस जारी है। हिमाचल और उत्तराखण्ड सरकार टौंस नदी पर किसाऊ डैम बनायेगें, बल। 236 मीटर ऊंचे इस बांध से 660 मेगावाट बिजली बनने का दावा है। क्वानू क्षेत्र के कोटा, मैलोत और मंज गांव की सैकडों हैक्टयर सिंचित जमीन पाताल हो जायेगी तब। धान का कटोरा कहा जाता है इस इलाके को। जब मक्का खेतों में खड़ा होता है तो हाथी भी छुप जाय उसमें। इतना घना और ऊंचा। पलायन करना यहां लोग जानते नहीं। पर अब डैम के लिए जबरदस्ती खदेडे़ जायेंगे। डैम किसलिए, बिजली बनाने, न भाई दिल्ली को पानी पहुंचाना है। लोकल लोग डैम विरोध में तेल लगाये लठ्ठों को उठाने को तैयार हो रहे हैं। यही तो गेम है। विरोध जितना तीखा और तीव्र होगा सौदेबाजी उतनी ही हाई लेबिल की होगी।
वक्ताओं के व्याख्यानों में गरमी आने लगी है। ये बात और है कि बारिष की वजह से बाहर के लान से उठकर डाकबंगले के बरामदे में गोष्ठियारों को सिमटकर बैठना पड़ रहा है। फायदा हुआ, मित्रों में अपनत्व की बयार घुटने और कंधे बार-बार छूनेे से बड़ गयी है। बोला जा रहा है कि राज्य बनने के बाद 32 हजार किमी. सडकें बनी पर 32 लाख लोग भी पहाड़ को टाटा/बाय-बाय कह गये हैं। मान लो इन्हीं नयी सडकों से यदि वे सब गये हैं तो 1 किमी. पर 100 आदमी। 1 साल में 2 लाख और 1 दिन में 548 लोग पहाड़ी मुल्क छोड़ गये हैं। 'बेडु पाको बारह मासा, काफल पाको चैता' पर नाचने वाले ठैरे। पर पहाड़ में ठहरना। बबा रे ! और सुन लो भाई-बहिनों, इन 16 सालों में 57 हजार हैक्टयर कृषि भूमि कम होने वाली हुयी पहाड़ में। बंदर बे-दखल कर रहे हैं, किसानों को खेतों से, जैसे कि हम पहाड़ी, बंदरों के खैयकर रहे हांे।
आदमी की सार्मथ्य उसकी 'संस्कृति, साहित्य और लोग' की षक्ल को रचता है। सार्मथ्य आती है, आर्थिक सम्पन्नता से। तो भाईओं और बहिनों, पहाड़ में पल नहीं पाये तो पलायन पा गये हम। अब तुम कुछ भी करो और कहो उसकी धार तो पलायन की ओर ही जायेगी। सर्वत्र वही सुनाई और दिखाई देगा। पहाड़ी संस्कृति का संकटचैथ अगर पंजाबी करवाचैथ में तब्दील हो गया तो उसमें करवाचैथ के पैसे की चमाचम ही तो है।.........जारी


























সিঙ্গুরের বাইরে বেদখল চাষিরা কবে জমি ফেরত পাবেন বা ক্ষেত মজুরদের কি হবে বা সত্যিই কি লাঙগল যার জমি তাঁরই?
পলাশ বিশ্বাস
সিঙ্গুর জয়ী।সিঙ্গুরে জমি অধিগ্রহণ অবৈধ।লাঙল যার,জমি তাঁর।
ভারতের সর্বোচ্চ আদালতের রায় বেনজির।
জনগণের রায়কে একেবারে খারিজ করে দিয়ে উন্নয়নের নামে সিঙ্গুরে জমি অধিগ্রহণ অবৈধ যদি হয়,এই নিরিখে,এই নজিরে সুপ্রিম কোর্টের এই রায়ে জোর জবরদস্তী সারা ভারতে উন্নয়নের নামে যে ভাবে জমি অধিগ্রহণকরা হয়েছে এবং সিঙ্গুরের আগেও স্বাধীনতার পর বাংলায় যত জমি চাষীদের আপত্তি সত্বেও অধিগ্রহণ করা হয়েছে,সর্বক্ষেত্রে সেই অধিগ্রহণও রদ করতে হয়।
বিশেষ করে যে ভাবে স্বাধীনতার পর থেকেই আদিবাসী ও দলিতদের জল জমি জঙ্গল ও জীবন জীবিকা থেকে উত্কাত করার একচেটিয়া আক্রমণের গণসংহার অভিযান এই রাযের আগে ও পরেও চলছে ও চলবে।
মনে রাখা দরকার যে সুপ্রীম কো্র্টের রায়ের পর পর মমতা ব্যানার্জির জয়ের আনন্দে চোখের জল মোছার আগে বা বিজয় উত্সব পালনের আগেই বাজার ও শিল্পমহলকে আশ্বস্ত করতে হয়ছে যে বাংলায় এই রায়ে লগ্নির পরিবেশ বিঘ্নিত হবে না।
চাষীদের এই ঐতিহাসিক রায় সিঙ্গুরে সীমাবদ্ধ থেকে যাওযারই সম্ভাবনা যেমন বেশি,তেমনই ক্ষেত মজুরদের অধিকারের লড়াইটাও বাকী থেকে যাওয়ার আশন্কা অনেক বেশি।বাকী বাংলা ও ভারতবর্ষের চাষীদের দজমি ফেরতের লড়াইও ঠিক তমন ভাবেই কছিন ও দীর্ঘতর।
জল জমি জঙগলের অধিকারের জন্য এখনো দীর্ঘ আইনী লড়াই বাকী আছে। যেমন সিঙ্গুরের ক্ষেত্রেও জমি মালিকেরা হয়ত জমি ফেরত পাবেন,দশ বছর অনাবাদ জমির ক্ষতিপূরণ হিসেবে তাঁদের জমির ক্ষতিপূরণের টাকা তাঁদের হাতেই থাকছে বা যারা চেক ভাঙাননি বা যারা আদৌ ক্ষতিপূরণ নেননি,তাঁদেরও ক্ষতিপূরণ মিলবে।
এই মামলায় জমি মালিকেরা জমি মালিকদের শুনানি হয়েছে এবং রায় তাঁদের পক্ষেই আপাতত। আপাতত যেহেতু সুপ্রিম কোর্টেই টাটাদের শুনানি এখনো চলছে এবং সুপ্রীম কোর্টের উচ্চতর বেন্চে এই রায়ের আপিলের শুনানির পর শেষ রায় কি হবে,এখনই বলা মুশকিল।সে যা হোক,রায় উলটে গেলেও শ্রীমতী মমতা ব্যানার্জির নেতৃত্বে সিঙ্গুরে মা মাটি মানুষের জয় এসেছে নিশ্চিতভাবেই এবং প্রস্তুতি যদি মুখ্যমন্ত্রী করে থাকেন ত সুপ্রীম কোর্টের রায় মোতাবেক শেষ রায় আসার আগেই বেদখল চাষিরা তাঁদের জমি ফেরত পাবেন।
জমির চরিত্র যেহেতু বদলে গেছে,যেহেতু তিন ফসলী ঔ জমি এখন কংক্রীটের খন্ডহর,তাই জমি ফেরত পেলেও ঔ জমিতে চাস আবাদ নূতনকরে হবেকিনা বা ঔ জমি নিয়ে জমি মালিকরা শেষ পর্যন্ত কি করবেন বা কি করতে পারেন,এই সমস্ত প্রশ্নের উত্তর এখনই মিলবে না।এককথায় সিঙ্গুর আজ জয়ী।
কিন্তু যারা প্রথম থেকে সিঙ্গুরে জমি ফেরত পাওয়ার লড়াইয়ে আন্দোলনের সিংহ ভাগে ছিলেন সেই লাঙল যাদের,যারা প্রকৃতপক্ষে জমি চাষ করেন ,সেইসব ক্ষেত মজুররা কি পেলেন,এই রায়ে সে কথা জানা গেল না।তাঁদের কোনো শুনানি হয়নি।তাঁরা জমি ফেরত ত পাচ্ছেন না,ক্ষতিপূরণের আদেশ ও তাঁদের জন্য হয়নি।
জমি আন্দোলনের নেত্রী ও বর্তমান বাংলার মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জি তাঁদের জন্য যদি পৃথক কোনো ব্যবস্থা করার কথা ভেবে থাকেন এবং সেই পরিকল্পনা বাস্তবায়িত করেন ত সর্বার্থে এই রায়ে লাঙল যার ,জমি তার তত্ব প্রতিষ্ঠিত হয়।
যথার্থই এই রায়ের রাজনৈতিক তাত্পর্য্য আইনি গুরুত্বের চাইতে অনেক গুণ বেশি।সুপ্রিম কোর্টের রায় শেষ পর্যন্ত সব মামলার শুনানি,আপীলের শুনানির পর কি দাঁড়ায় এবং কত তাড়াতাড়ি চাষিরা তাঁদের জমি ফেরত পাবেন বা ক্ষেত মজুরদের জন্য মমতা ব্যানার্জি কিছু করতে পারেন কি পারেন না,তার চাইতে বড় কথা হল উন্নয়নের পুঁজিবাদী পন্থা অবলম্বন করে অন্ধ নগরায়ণ ও শিল্পায়ণে গুরুত্ব দিয়ে,বাম নেতৃত্ব ও সরকার যে ঐতিহাসিক ভূল করেছিল,ভূমি সংস্কারের ও কৃষি ভিত্তিক উন্নযনের পথ ত্যাগ করে তাঁরাও যে মুক্ত বাজারের নবউদারবাদী অর্থনীতিতে রাজনৈতিক মতাদর্শ এবং সারা ভারতে বামপন্থার প্রাসঙ্গিকতা বিসর্জন দিয়ে আত্মহত্যা করেছেন সেই তত্ব নির্ণায়ক ভাবে এই রায়ে প্রমাণিত হল।
উন্নযণের স্বার্থে নয়,জনগণের স্বার্থেও নয়,বামপন্তী নেতৃত্ব ও বাম সরকার সরাসরি হার্মাদ বাহিনী হয়ে জোর জবরদস্তী চাষিদের তাঁদের জমি থেকে বেদখল করেছেন ব্যাক্তি ও করপোরেট পুঁজির স্বার্থে।
গণহত্যার রক্তে রাঙানো ঔ লাল ঝান্ডার পতপত করে ওড়া আরো মুশকিল।
সেই অর্থে এই রায়ের ফলে ভারতে বামপন্থীদের রাজনৈতিক অস্তিত্বই বিপন্ন হয়ে পড়ল এবং জল জমি জহ্গলের লড়াইয়ে নেতৃত্ব করার অদিকার তাঁরা যেমন হারাল,মেহনতী মানুষের হাত থেকে লাল ঝান্ডা কেড়ে নিয়ে তাঁদের লড়াই থেকে চিকরকালের মত বামপন্থীরা বিচ্ছিন্ন হয়ে গেল এবং বাংলায় নিকট ভবিষ্যতে তাঁদের ফিরে আসার যেমন সম্ভাবনা রইল না,তেমনই মমতা ব্যানার্জির প্রতিপক্ষ বলে আর কিছু থাকল না।
সারা ভারতে জমি আন্দোলনে নেতৃত্ব দিতে মমতা ব্যানার্জি ইচ্ছুক কিনাএটা এখন বড় প্রশ্ন।সুপ্রিম কোর্টের এি রায়ে তিনি নিঃসন্দেহ ভারতবর্ষে জমি আন্দোলনের সব থেকে বড় নেতা হিসেবে প্রতিষ্ঠিত হলেন কিন্তি শধু সিঙ্গুরের চাষীদের জমি ফেরতের লড়াইযের বাইরে তিনি বাংলায় অন্যত্র বা সারা দেশে বেআইনী জমি অধিগ্রহণের বিরুদ্ধে জনগণের নেতৃত্ব দিতে পারবেন কি না সেই প্রশ্ন বামপন্থীরা আবার চাষিদের,মেহমনতী মানুষদের,সর্বহারাদের নেতৃত্ব দিতে পারবেন কিনা,একই রকম ঘোরতর জটিল প্রশ্ন,যার উত্তর আপাতত নেই।